श्रीलाभसुभगः सत्यासक्तः स्वर्गापवर्गदः ।जयतात् त्रिजगत्पूज्यः सदाचार इवाच्युतः ॥ १ ॥
अच्युत भगवान् की तरह तीनों लोकों में पूज्य सदाचार विजयी हो। अच्युत भगवान् की भाँति सदाचार भी स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करता है। भगवान् और सदाचार दोनों श्री-सम्पन्न होकर सौभाग्यशाली हैं। अच्युत भगवान् सत्या (सत्यभामा) में अनुरक्त हैं तो सदाचार सत्य में आसक्त है ॥ १ ॥
ब्राह्मे मुहूर्ते पुरुषस्त्यजेन्निद्रामतन्द्रितः ।प्रातः प्रबुद्धं कमलमाश्रयेच्छ्रीर्गुणाश्रया ॥ २ ॥
मनुष्य को ब्राह्ममुहूर्त में आलस्य छोड़कर जाग जाना चाहिए । गुणों का आश्रय लेनेवाली श्री (शोभा) प्रातःकाल खिले हुए (जागे हुए) कमल पर जा विराजती है ॥ २ ॥
पुण्य-कार्यों से शरीर को सदैव पवित्र और स्नान द्वारा उसेस्वच्छ रखना चाहिए । इन्द्र ने वृत्र नाम के असुर को मारने से उत्पन्न पाप स्नान करके ही दूर किया था ॥ ३ ॥
न कुर्वीत क्रियां कांचिदनभ्यर्च्य महेश्वरम् ।ईशार्चनरतं श्वेतं नाभून्नेतुं यमः क्षमः ॥ ४ ॥
भगवान् महेश्वर की पूजा किये बिना कोई काम न करना चाहिए । ईश्वर की अर्चना में लगे रहने के कारण ही श्वेत-मुनि को यमराज यमपुरी ले जाने में असमर्थ रहें ॥ ४ ॥
श्राद्धं श्रद्धान्वितं कुर्याच्छास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।भुवि पिण्डं ददौ विद्वान् भीष्मः पाणौ न शन्तनोः ॥ ५ ॥
श्रद्धापूर्वक शास्त्रों में बताई गयी विधि के अनुसार ही श्राद्ध करना चाहिए। शास्त्र पर श्रद्धा करने के कारण ही विद्वान् भीष्म ने अपने पिता शन्तनु के हाथों में पिण्ड न दे कर भूमि पर ही पिण्ड को रख दिया ॥५॥
अर्थिभुक्तावशिष्टं यत् तदश्नीयान्महाशयः ।श्वेतोऽर्थिरहितं भुक्त्वा निजमांसाशनोऽभवत् ॥ ७ ॥
भिखमंगों, याचकों को कुछ देकर ही भोजन करना चाहिए ।एक बार राजा श्वेत ने किसी भिखारी को कुछ दिए बिना ही स्वयं भोजन कर लिया था इसलिए मरने के बाद परलोक में उसे खाने को कुछ नहीं दिया गया, भूख के मारे उसे अपना ही मांस नोचनोचकर खाना पड़ा ॥७॥
जपहोमार्चनं कुर्यात् सुधौतचरणः शुचिः ।पादशौचविहीनं हि प्रविवेश नलं कलिः ॥ ८ ॥
अच्छी तरह पैर धोकर ही जप, होम और देवताओं का पूजन करना चाहिए । पैरों को अपवित्र रखने के कारण ही राजा नल के शरीर में <error>कलियुग</error><fix>कलिपुरुष</fix> ने प्रवेश किया ॥ ८ ॥
न सञ्चरणशीलः स्यान्निशि निःशङ्कमानसः ।माण्डव्यः शूललीनोऽभूदचौरश्चौरशङ्कया ॥ ९ ॥
निर्भय होकर रात में न घूमना चाहिए। रात में निर्भय होकर घूमने के कारण ही चोर न होते हुए भी माण्डव्य ऋषि को चोर समझकर उन्हें शूली पर चढ़ा दिया गया था ॥ ९ ॥
न कुर्यात् परदारेच्छां विश्वासं स्त्रीषु वर्जयेत् ।हतो दशास्यः सीतार्थे हतः पत्न्या विदूरथः ॥ १० ॥
मनुष्य को चाहिए कि परायी स्त्री पर अनुराग और स्त्रियों पर विश्वास न करे। राम-पत्नी सीता की कामना रखने से ही रावण का वध हुआ तथा पत्नी (पर विश्वास करने) के कारण ही विदूरथ मारा गया ॥ १० ॥
सात्त्विक भावना रखकर ही दान देना चाहिए । पश्चात्ताप से दूषित दान कभी न देना चाहिए । दान के शेष अंश की शुद्धि के लिए ही बलि ने अपने आपको बन्धन में डाल दिया था ॥ १८ ॥
सत्त्वगुण से पूर्ण व्यक्ति को चाहिए कि वह त्याग (दान) के बदले कुछ पाने की इच्छा न करे । कर्ण ने इन्द्र को अपने कुण्डलों का दान दिया परन्तु उसने शक्ति की याचना की इसलिए कर्ण में मलिनता आ गयी ॥ १९ ॥
ब्राह्मणान्नावमन्येत ब्रह्मशापो हि दुःसहः ।तक्षकाग्नौ ब्रह्मशापात् परीक्षिदगमत् क्षयम् ॥ २० ॥
ब्राह्मणों का कभी अपमान न करना चाहिए, क्योंकि (अपमानित) ब्राह्मणों का शाप ही असह्य दुःखकारक होता है। ब्राह्मण के शाप से ही राजा परीक्षित को तक्षक नाग ने काट लिया और वह ब्राह्मण की शापाग्नि में भस्म हो गया ॥ २० ॥
दम्भारम्भोद्धतं धर्मं नाचरेदन्तनिष्फलम् ।ब्राह्मण्यदम्भलब्धास्त्रविद्या कर्णस्य निष्फला ॥ २१ ॥
दम्भपूर्वक उद्धत हो कर धर्म का आचरण नहीं करना चाहिए क्योंकि इस प्रकार से किया गया धर्म अन्त में निष्फल ही होता है। कर्ण ने ब्राह्मण का छद्मवेष धारण कर परशुराम से अस्त्रविद्या सीखी । उनसे उसने ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया, लेकिन कपट का भण्डाफोड़ हो जाने पर उसे वर के स्थान पर यह शाप मिला कि तुम्हारा ब्रह्मास्त्र निष्फल होगा ॥ २१ ॥
जो सेवा करने के योग्य न हो उसकी सेवा धन का लोभ रख कर न करनी चाहिए । दुर्योधन जैसे दुष्ट व्यक्ति की सेवा करने से ही भीष्म-द्रोण जैसे महापुरुषों, महासेनापतियों का नाश हुआ ॥ २२ ॥
दूसरों की प्राण-रक्षा के लिए तत्पर तथा दयावान् अवश्य होना चाहिए । शिबि ने कपोत (कबूतर) की रक्षा के लिए श्येन पक्षी (बाज) को अपना शरीर ही दे डाला ॥ २३ ॥
स्त्रीजितो न भवेद् धीमान् गाढरागवशीकृतः ।पुत्रशोकाद् दशरथो जीवं जायाजितोऽत्यजत् ॥ २६ ॥
बुद्धिमान् मनुष्य को प्रगाढ प्रेम में पड़कर स्त्री के वशीभूत न होना चाहिए । स्त्री के वशीभूत होने से ही राजा दशरथ को पुत्रशोक से प्राण छोड़ने पड़े ॥ २६ ॥
स्वामी को प्रिय लगने वाली ऐसी चुगलखोरी न करनी चाहिए, जिसमें दूसरों को क्लेश हो । चुगलखोरी करने से ही सूर्य और चन्द्रमा को राहु ग्रस लिया करता है ॥ २९ ॥
कुर्यान्नीचजनाभ्यस्तां न याच्ञां मानहारिणीम् ।बलियाच्ञापरः प्राप लाघवं पुरुषोत्तमः ॥ ३० ॥
अधम व्यक्तियों द्वारा सदैव की जाने वाली तथा सम्मान को मिटा देने वाली याचना न करनी चाहिए । बलि से याचना करने के कारण ही भगवान् विष्णु को विराट् से वामन रूप धारण करना पड़ा ॥ ३० ॥
न बन्धुसंबन्धिजनं दूषयेन्नापि वर्जयेत् ।दक्षयज्ञक्षयायाभूत् त्रिनेत्रस्य विमानना ॥ ३१ ॥
भाई-बन्धुओं, नातेदारों-रिश्तेदारों का न तो अपमान करना चाहिए, न उन्हें रोकना चाहिए । अपने दामाद शिव जी का अपमान करने से ही दक्ष के यज्ञ का विध्वंस हुआ ॥ ३१ ॥
न विवादमदान्धः स्यान्न परेषाममर्षणः ।वाक्पारुष्याच्छिरश्छिन्नं शिशुपालस्य शौरिणा ॥ ३२ ॥
विवाद में पड़ कर न तो मदान्ध होना चाहिए और न दूसरों पर असहनशीलता प्रकट करनी चाहिए। वचनों की कठोरता के कारण ही भगवान् कृष्ण ने शिशुपाल का शिर काट लिया था ॥ ३२ ॥
बुद्धिमान् पुरुष को बार-बार धन की याचना करके किसी को उद्विग्न न करना चाहिए । अश्व, रत्न और लक्ष्मी देने पर भी जब समुद्र मथा गया तो वह विष उगलने लगा ॥ ३४ ॥
कुटिल, निष्ठुर और लोभी मनुष्यों के साथ प्रेम-संबन्ध न रखना चाहिए। निमन्त्रण पाकर वशिष्ठ के यहाँ पहुँचे हुए विश्वामित्र ने उनकी धेनु का ही अपहरण कर लिया ॥ ३५ ॥
कठोर तपस्या में लीन व्यक्तियों की भी इन्द्रियों पर विश्वास न करना चाहिए। (महातपस्वी होते हुए भी) विश्वामित्र ने उत्सुक हो कर मेनका अप्सरा को गले लगा लिया था ॥ ३६ ॥
किसी प्रकार के वियोग से उत्पन्न दुःख में दीनता छोड़कर धैर्य धारण करना चाहिए। अश्वत्थामा का वध सुनते ही धैर्य छोड़ देने के कारण ही द्रोणाचार्य को मरना पड़ा ॥ ३७ ॥
बुद्धिमान् को चाहिए कि वह कभी भी क्रोध रूपी राक्षस के वशीभूत न हो । क्रोध के वशीभूत होने के कारण ही भीम ने राक्षस की भाँति दुःशासन की छाती का खून पिया था ॥ ३८ ॥
कभी भी सज्जन पुरुषों की बात का ऐसा उल्लंघन करना चाहिए जिससे उनके हृदय में चोट पहुँचे। ऐसे ही अपराध पर शंकर जी ने वेदवादी ब्रह्मा के चारों मुखों को कतर दिया था ॥ ४१ ॥
तत्त्ववेत्ता पुरुष को चाहिए कि वह जाति की अपेक्षा गुणों का आदर करे । द्रोण का पुत्र जाति से ब्राह्मण होते हुए भी कर्म से शूद्र था और जन्म से शूद्र होते हुए भी विदुर क्षमाशील ब्राह्मण था ॥ ४२ ॥
मनुष्य को मृत्यु के बाद पुनः स्मरण की जाने पर यश रूपी शरीर को जीवित रखने वाली प्रसिद्धि की रक्षा करनी चाहिए। राजा इन्द्रद्युम्न मरने के बाद स्वर्ग गया। पुण्य क्षीण हो जाने के बाद जब वह फिर मृत्युलोक में आया तो एक दीर्घजीवी <error>कछुये</error><fix>कछुवे</fix> ने उसके यश का पुनः विस्तार किया, जिससे वह फिर स्वर्ग का हिस्सेदार बना ॥ ४५ ॥
शीघ्र ही भाग जानेवाली राजलक्ष्मी की रक्षा कायरता से न करनी चाहिये । प्रसिद्ध है कि राजा नन्द की राजलक्ष्मी व्याडि और इन्द्रदत्त ने युक्ति से हरण कर ली थी ॥ ४६ ॥
शक्तिहीन हो जाने पर आदमी को सहनशील बन जाना चाहिए। निर्बल होकर किसी सबल पर आक्रमण या आक्षेप न करना चाहिए । कार्तवीर्य अर्जुन ने रावण को आक्षेप करने के कारण ही बाँध लिया था ॥ ४७ ॥
सदा धूर्त्तता से भरे हुए वेश्या के वचन पर भूलकर भी विश्वास न करना चाहिए । योगी और विरागी होते हुए भी ऋष्यशृङ्ग वेश्या द्वारा आसक्त और शृङ्गारी बना दिये गये ॥ ४८ ॥
शक्ति के अभिमान से चूर होकर छोटे से छोटे शत्रु का भी अपमान न करना चाहिए । शक्ति के अभिमान से चूर परशुराम को बाल रूप राम ने ब्राह्मण समझकर ही छोड़ा था ॥ ४९ ॥
एकान्त में यदि माता भी हो तो मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी इन्द्रियों को काबू में रखे । शम्बर असुर की स्त्री अपने पुत्र तुल्य दामाद प्रद्युम्न पर भी कामासक्त हो गयी थी ॥ ५२ ॥
दुष्टों को शिक्षा देकर अपनी वाणी को व्यर्थ न करना चाहिए। देखिए, शुक्राचार्यजी की छः गुणों से युक्त नीति से सुरक्षित रहते हुए भी दानव अन्त में नष्ट हो गये ॥ ६४ ॥
जो क्रोधी, तुनुक मिज़ाज़ी हों और स्थायीरूप से शत्रुता के भाव रखने वाले हों, उन्हें नाराज़ न करना चाहिए। चाणक्य ने ऐसे ही क्रोध के कारण सात दिन के अन्दर नन्दवंश को नष्ट कर दिया ॥ ६५ ॥
सतियों की तपस्या से प्रज्वलित क्रोधाग्नि को कुपित न करना चाहिए । रावण के वध के लिए वेदवती ने अपना शरीर छोड़ (कर सीता के रूप में जन्म लिया और अन्त में उसे समूल नष्ट कर) दिया ॥
विद्या और विनय के साधन गुरु की आराधना श्रद्धा और भक्ति से करनी चाहिए । राम की भक्ति से प्रसन्न होकर गुरु विश्वामित्र जी ने उन्हें बड़े-बड़े अमोघ अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये थे ॥ ६७ ॥
किसी को कुछ देने का वायदा करने पर अथवा जिसे नियत समय पर दान दिया जाता हो उसे बिना माँगे ही खुद दे देना चाहिये । न तो उसे माँगना पड़े और न किसी के दबाव डालने पर ही दिया जाय । ऐसा न करने से बदनामी होती है । राजा द्रुपद ने गुरु द्रोणाचार्य को राज्य मिलने पर उसका कुछ हिस्सा दे देने का वायदा किया था, किन्तु राज्य मिलने पर उसने उन्हें नहीं दिया तो द्रोणाचार्य ने अर्जुन के द्वारा उस पर आक्रमण कराकर उससे अपना हिस्सा ले लिया था ॥ ६८ ॥
धर्म, अर्थ और काम की साधना इतनी मात्रा में करनी चाहिए कि वे एक दूसरे के बाधक न बन <error>जायँ</error><fix>जाय</fix> । सगर आदि प्राचीनमहापुरुष, राजा महाराजा इसी त्रिवर्ग की उचित नियमित साधना करने वाले थे ॥ ६६ ॥
अपने वंश से कम होने की इच्छा कभी न करनी चाहिए । उसके बराबर या उससे अधिक होने का प्रयत्न करते रहना चाहिए । रघुवंश का उत्कर्ष होने पर भी श्रीराम उस कुल से भी अधिक उन्नतिशील हो गये ॥ ७० ॥
आपत्ति के समय मदद देने वाली कलाओं की भी जानकारी रखनी चाहिए। पता नहीं कौन कला किस समय काम दे जाय । अर्जुन जैसे महान् योद्धा और विद्वान् ने आपत्ति के समय राजा विराट के यहाँ नृत्यकला सिखाने की जीविका प्राप्त की थी ॥ ७२ ॥
मनुष्य को चाहिए कि अपनी बुद्धि को भोग-विलास में आसक्तन बनाये। राजा जनक राजकाज करते हुए भी उससे इस तरह निर्लिप्त रहते थे, जैसे जल में कमल का पत्ता ॥ ७३ ॥
नष्टशीलां त्यजेन्नारीं रागवृद्धिविधायिनीम् ।चन्द्रोच्छिष्टाधिकप्रीत्यै पत्नी निन्द्याप्यभूद् गुरोः ॥ ७५ ॥
भोग-विलास बढ़ानेवाली दुराचारिणी स्त्री को त्याग देना चाहिए । चन्द्रमा द्वारा बरती गयी अपनी पत्नी पर अधिक प्रीति होने के कारण देवगुरु बृहस्पति ने उसे जब पुनः स्वीकार कर लिया तो उनकी बड़ी निन्दा हुई ॥ ७५ ॥
कुसुम के समान सुकोमल स्त्रियों को अपनी तीक्ष्णता से कभी उद्विग्न न करना चाहिए । अपनी पत्नी का भय दूर करने के लिए सूर्य को अपना तेज कम करना पड़ा था ॥ ७७ ॥
महापुरुषों से प्राप्त उपदेशामृत को हृदय-घट में सुरक्षित रखना चाहिए । फूटे हुए घड़े के समान उसे बहा न देना चाहिए । देखिये, अर्जुन गीता का अर्थ भूल कर लड़ाई करने और गुणों में दोषों को देखने में ही निरत हो गया था ॥ ७९ ॥
न पुत्रायत्तमैश्वर्यं कार्यमार्यैः कदाचन ।पुत्रार्पितप्रभुत्वोऽभूद् धृतराष्ट्रस्तृणोपमः ॥ ८० ॥
विवेकी मनुष्य को चाहिए कि वह अपना ऐश्वर्य सहसा अपने पुत्रों को न सौंप दे । धृतराष्ट्र अपने प्रभुत्व को पुत्रों को सौंप देने के कारण ही तिनका के समान बन गया था ॥ ८० ॥
शत्रु होते हुये विशेष रूप से दुष्टता करने वालों के कन्धे पर किसी कार्य का भार नहीं देना चाहिए । शल्य द्वारा तेज का हानि करने से पीड़ित हुआ कर्ण प्रतापहीन हो गया ॥ ८१ ॥
अपने स्वामी द्वारा ऊँचा सम्मान प्राप्त करने के लिए क्लेशकारक फल को स्वीकार न करना चाहिए । शंकर भगवान् द्वारा शिर पर धारण किये जाने पर भी चंद्रमा क्षीण ही बना हुआ है ॥ ८२ ॥
श्रुतिस्मृत्युक्तमाचारं न त्यजेत् साधुसेवितम् ।दैत्यानां श्रीवियोगोऽभूत् सत्यधर्मच्युतात्मनाम् ॥ ८३ ॥
सज्जनों द्वारा सेवित श्रुतियों, स्मृतियों द्वारा बताये गये आचरण को न छोड़े । सत्य-धर्म का परित्याग करने से ही दैत्यों को लक्ष्मी से हाथ धोना पड़ा ॥ ८३ ॥
भाई-भाई के बीच उत्पन्न वैरभाव को दूर करने का उपाय करना चाहिए । किसी एक का पक्ष ग्रहण कर उनके वैर को बढ़ाना न चाहिए । कौरवों और पाण्डवों के युद्ध में बलरामजी निष्पक्ष ही बने रहे ॥ ८८ ॥
गरीब भाई का भरण-पोषण करना चाहिए । मित्र की विपत्ति से रक्षा करनी चाहिए । बन्धुओं और मित्रों के साथ ऐसा ही व्यवहार करने से बलि याचकों का कल्पवृक्ष बना हुआ था ॥ ९० ॥
न कुर्यादभिचारोग्रवध्यादिकुहकाः क्रियाः ।लक्ष्मणेनेन्द्रजित् कृत्याद्यभिचारमयो हतः ॥ ९१ ॥
किसी का वध करने के लिए मारण-प्रयोग, कुहक-क्रिया आदि तांत्रिक प्रयोग कभी नहीं करने चाहिए । लक्ष्मण जी ने कृत्या आदि जैसे उग्रतांत्रिक प्रयोग करने वाले इन्द्रजित् मेघनाद का वध कर डाला था ॥ ९१ ॥
मनुष्य को क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास इन चार आश्रमों में जाना चाहिए । ययाति आदि प्राचीन राजाओं ने इसी क्रम से एक आश्रम के बाद दूसरे आश्रम में प्रवेश <error>किया था</error><fix>किये थे</fix> ॥ ९२ ॥
आवश्यकता से अधिक धन-संपत्तियों का व्यय अपने हाथों से कर देना चाहिए । नहीं तो अगस्त्य द्वारा वातापि नामक दैत्य का भक्षण किये जाने पर जैसे दूसरों ने उसके कोश का व्यय किया उसी प्रकार अन्य लोग व्यय कर डालेंगे ॥ ९३ ॥
वृद्धावस्था आ जाने पर मोक्ष प्राप्त करने का उपाय करना चाहिए जिससे दुबारा न वृद्ध होना पड़े, न पैदा होना पड़े । विदुर ने पुनर्जन्म का बीज (शुभाशुभ कर्म) ज्ञानरूपी अग्नि में भस्म कर डाला था ॥ ९६ ॥
निश्चित अवधि पर मर जाने से पूर्व ही अच्छे कामों से जीवित रहने का उपाय करना चाहिए । मान्धाता आदि पुण्यात्मा महापुरुष आज भी अपने यशःशरीर से जीवित हैं ॥ ९८ ॥
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क्षेमेन्द्र ; श्री देवदत्त शास्त्री
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