This page has not been fully proofread.

लाङ्गूलोपनिषत्
 
२४५
 
तिकज्वर-विषमज्वर-शीतज्वर-एकाहिकज्वर-द्वयाहिकज्वर- त्र्यैहिकज्वर-चातु -
र्थिकज्वर - अर्धमासिकज्वर - मासिकज्वर - षाण्मासिकज्वर-सांवत्सरिकज्वर-अ-
स्थ्यन्तर्गतज्वर-महापस्मार - श्रमिकापस्मारांश्च भेदय भेदय खादय खादय
ॐ ह्रां ह्रीं हूं हुं फट् घेघे स्वाहा ॥
 
ॐ नमो भगवते चिन्तामणिहनुमते अङ्गशूल-अक्षिशूल-शिरश्शूल-
गुल्मशूल - उदरशूल - कर्णशूल - नेत्रशूल गुदशूल-कटिशूल- जानुशूल- जङ्घाशूल - ह -
स्तशूल-पादशूल-गुल्फशूल-वातशूल- पित्तशूल-पायुशूल-स्तनशूल परिणामशूल-
परिधामशूल परिबाणशूल - दन्तशूल - कुक्षिशूल सुमनश्शूल - सर्वशूलानि निर्मूलय
निर्मूलय दैत्यदानवकामिनीवेतालब्रह्मराक्षसकोलाहलनागपाशानन्तवासुकि-
 
-
 
तक्षककार्कोटकलिङ्गपद्मककुमुदज्वलरोगपाशमहामारीन् कालपाशविषं निर्विषं
कुरु कुरु ॐ ह्रां ह्रीं हुं हुं फट् घे घे स्वाहा ॥
 
ह्रीं श्रीं क्लीं ग्लां ग्लीं ग्लूं ॐ नमो भगवते पातालगरुडहनुमते
भैरववनगतगज सिंहेन्द्राक्षीपाशबन्धं छेदय छेदय प्रलयमारूत कालाग्नि-
हनुमन् शृङ्खलाबन्धं विमोक्षय विमोक्षय सर्वग्रहं छेदय छेदय मम सर्वका-
र्याणि साधय साधय मम प्रसादं कुरु कुरु मम प्रसन्न श्रीरामसेवक सिंह
भैरवस्वरूप मां रक्ष रक्ष ॐ ह्रां ह्रीं हूं ह्रां ह्रीं क्ष्मों मैं श्रां श्रीं क्लीं क्लीं
क्रां क्रीं ह्रां ह्रीं हूं हैं ह्रौं ह्र: ह्रां ह्रीं हुं ख ख जय जय मारण मोहन
घूर्ण घूर्ण दम दम मारय मारय वारय वारय खे खे ह्रां ह्रीं हूं हुं फट्
घेघे स्वाहा ॥
 
ॐ नमो भगवते कालाग्मिरौद्रहनुमते भ्रामय भ्रामय लव लव
कुरु कुरु जय जय हस हस मादय मादय प्रज्वलय प्रज्वलय मृडय मृडय
त्रासय त्रासय साहय साहय वशय वशय शामय शामय अस्त्र त्रिशूलडमरुखङ्ग-
कालमृत्युकपालखटुाङ्गधर अभयशाश्वत हुं हुं अवतारय अवतारय हुं हुं