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वर्णानुक्रमणिका ।
 
३०१
 
पृष्ठम्
 
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यथा नद्यः स्यन्दमानाः
 
७८
 
परीक्ष्य लोकान्कर्म •
 
२८
 
यथोर्णनाभिः सृजते
 
१६
 
पुरुष एवेदं विश्वं
 
४२ यदचिमद्यदणुभ्योऽणु
 
४५
 
पुरुषे ह वा अय०
 
२७८
 
यदा पश्यः पश्यते
 
६२
 
प्रणवो धनुः शरो
 
४७
 
यदा लेलायते ह्यर्चिः
 
२०
 
प्राणो ह्येष यः सर्व
 
६३ यदेतदयं मनश्चैतत्
 
२८९
 
प्लवा ह्येते अदृढा
 
२४
 
यस्मिन्द्यौः पृथिवी
 
४८
 

 
यस्याग्निहोत्रमदर्श •
 
२१
 
बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्य •
 
६६
 

 
ब्रह्मा देवानां प्रथमः
 
वेदान्त विज्ञानसुनि ०
 
७५
 
ब्रह्मैवेदमृतं
 

 
भिद्यते हृदयग्रन्थिः
 

 
शौनको ह वै महाशालो
 

 
११
 
म.
 
स इमाँल्लोकानसृजत
 
२५१
 
मनोमयः प्राणशरीर ०
 
५१
 
स ईक्षत कथं न्विदं
 
२६३
 

 
स ईक्षतेमे नु लोकाः
 
२५२
 
यं यं लोकं मनसा
 
६९
 
स ईक्षतेमे नु लोकाश्व
 
२६०
 
यः सर्वज्ञः सर्ववित्
 
१८
 
स एतमेव सीमानं
 
२६५
 
यः सर्वज्ञः सर्ववित्
यत्तदद्रेश्यमग्राह्य •
 
४९
 
स एतेन प्रज्ञेनात्मना
 
२९३
 
१४
 
स एवं विद्वानस्मा ०
 
२८३
 
यत्र सुप्तो न कंचन
 
९४ संप्राप्यैनमृषयो
 
७४