2026-02-28 17:36:15 by akprasad
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<subtitle>॥ श्रीः ॥
</subtitle>
<title>॥ मोहमुद्गरः ॥
</title>
<verse>भज गोविन्दं भज गोविन्दं
भज गोविन्दं मूढमते ।
संप्राप्ते संनिहिते काले
न हि न हि रक्षति डुकृञ्करणे ॥ १ ॥
</verse>
<verse>मूढ जहीहि धनागमतृष्णां
कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं
वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥ २ ॥
</verse>
<verse>नारीस्तनभरनाभीदेशं
दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम् ।
एतन्मांसवसादिविकारं
मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥ ३ ॥
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<subtitle>॥ श्रीः ॥
<title>॥ मोहमुद्गरः ॥
<verse>भज गोविन्दं भज गोविन्दं
भज गोविन्दं मूढमते ।
संप्राप्ते संनिहिते काले
न हि न हि रक्षति डुकृञ्करणे ॥ १ ॥
<verse>मूढ जहीहि धनागमतृष्णां
कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं
वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥ २ ॥
<verse>नारीस्तनभरनाभीदेशं
दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम् ।
एतन्मांसवसादिविकारं
मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥ ३ ॥
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