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॥ श्रीः ॥
 
॥ मोहमुद्गरः ॥
 
भज गोविन्दं भज गोविन्दं
 
भज गोविन्दं मूढमते ।
संप्राप्ते संनिहिते काले
 
न हि न हि रक्षति डुकृञ्करणे ॥ १ ॥
 
मूढ जहीहि धनागमतृष्णां
 
कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं
 
वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥ २ ॥
 
नारीस्तनभरनाभीदेशं
 
दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम् ।
 
एतन्मांसवसादिविकारं
 
मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥ ३ ॥