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श्रीविष्णुभुजंगप्रयातस्तोत्रम् ।
 
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समानोदितानेकसूर्येन्दुकोटि-
 

प्रभापूर तुल्यद्युतितिं दुर्निरीक्षम् ।

न शीतं न चोष्णं सुवर्णावदात-
 

प्रसन्नं सदानन्दसंवित्स्वरूपम् ॥ ४ ॥
 
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सुनासापुटं सुन्दरभ्रूललाटं

किरीटोचिताकुञ्चितस्निग्धकेशम् ।

स्फुरत्पुण्डरीकाभिरामायताक्षं
 

समुत्फुल्लरत्नप्रसूनावतंसम् ॥ ५ ॥
 
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लसत्कुण्डलामृष्टगण्डस्थलान्तं
 

जपारागचोराधरं चारुहासम् ।
 

अलिव्याकुला मोदिमन्दारमालं

महोरस्फुरत्कौस्तुभोदारहारम् ॥ ६ ॥
 
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सुरत्नाङ्गदैरन्वितं बाहुदण्डै-
 

श्चतुर्भिश्चलत्कङ्कणालंकृतायैःग्रैः
 

उदारोदरालंकृतं पीतवस्त्रं
 

पदद्वन्द्वनिर्धूतपद्माभिरामम् ॥ ७ ॥
 
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