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.१५८
 
श्लोकानुक्रमणिका ।
 
पृष्ठम्
 
पृष्ठम्
 
संपत्कराणि सकले ०
 
.७३
 
सदा सेव्यः कृष्णः
 
६१
 
संमूयाम्भोधिमध्यात्
 
२९ सदैव नन्दिनन्द ०
 
९७
 
संसारकूपमतिघोर
 
१४
 
सनत्कुमार
 
९३
 
संसारघोर गहने
 
१५
 
स पुण्यः स गण्यः
 

 
संसारजालपतितस्य
 
१४
 
सबिन्दुसिन्धु
 
९२
 
संसारदावदहना •
 
१३
 
समस्तवासनात्यागं
 
१०९
 
संसारभीकरकरीन्द्र
 
१४
 
समाधिरात्मनो
 
१११
 
संसारवृक्षमखबीज
 
१५
 
समानोदितानेक
 
१९
 
संसारसर्पविषदिग्ध
 
१४
 
सम्यक्साह्यं
 
२६
 
संसारसागरनिमजन
 
१५
 
सरसिजनिलये
 
७३
 
संसारसागरविशाल
 
१५
 
सर्व
 
दृष्ट्वा
 
स्वात्मनि
 
४८
 
संस्तीर्ण कौस्तुभांशु
 
२९
 
सर्वजीवरक्षणैक
 
१२५
 
संचूर्ण ताम्बूलं
 
६०
 
सर्वज्ञो यो यश्च
 
४५
 
सत्तामात्रं केवल
 
५४ सर्वत्रास्ते सर्वशरीरी
 
४८
 
सत्यं ज्ञानं शुद्धं
 
४९
 
सर्वत्रैकः पश्यति
 
४८
 
सत्यं ज्ञानमनन्तं
 
५६ सर्वदुर्वासनाजालं
 
१११
 
सत्यपि भेदापगमे
 
११७
 
सर्वमङ्गलाकुचा ०
 
१२५
 
सत्सङ्गत्वे
 
६४ सानन्दमानन्दवने
 
१३१
 
सदां तृप्तान्नं
 
६०
 
सिंहाद्रिपार्श्वेऽपि
 
१३२
 
सदा राम..
 
.....पिबन्त •
 

 
सुखतः क्रियते
 
६९
 
सदा राम......पिबन्न •
 
८ सुनासापुटं सुन्दर ०
 
१९