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<subtitle>॥ श्रीः ॥</subtitle>
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॥ काशीपञ्चकम् ॥
 
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मनो निवृत्तिः परमेोमोपशान्तिः
 

सा तीर्थवर्या मणिकर्णिका च ।
 

ज्ञानप्रवाहा विमलादिगङ्गा
 

सा काशिकाहं निजबोधरूपा ॥ १ ॥
 
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यस्यामिदं कल्पितमिन्द्रजालं
 

चराचरं भाति मनोविलासम् ।
 

सच्चित्सुखैका परमात्मरूपा
 

सा काशिकाहं निजबोधरूपा ॥ २ ॥
 
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कोशेषु पश्वञ्चस्वधिराजमाना
 

बुद्धिर्भवानी प्रतिदेहगेहम् ।
 

साक्षी शिवः सर्वगतोऽन्तरात्मा
 

सा काशिकाहं निजबोधरूपा ॥ ३ ॥
 
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