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११८
 
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षट्पदीस्तोत्रम् ।
 
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उद्धृतनग नगभिदनुज
 

दनुजकुलामित्र मित्रशशिदृष्टे ।
 

दृष्टे भवति प्रभवति
 

न भवति किं भवतिरस्कारः ॥ ४ ॥
 
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मत्स्यादिभिरवतारै-
 

रवतारवतावता सदा वसुधाम् ।
 

परमेश्वर परिपाल्यो
 

भवता भवतापभीतोऽहम् ॥ ५ ॥
 
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दामोदर गुणमन्दिर
 

सुन्दरवदनारविन्द गोविन्द ।
 

भवजलधिमथनमन्दर
 

परमं दरमपनय त्वं मे ॥ ६ ॥
 
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नारायण करुणामय
 

शरणं करवाणि तावकौ चरणौ I
 

इति षट्पदी मदीये
 

वदनसरोजे सदा वसतु ॥ ७ ॥
 
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इति षट्पदीस्तोत्रं संपूर्णम् ॥
 
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