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हनुमत्पञ्चरत्नम् ।
 
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दूरीकृत सीतार्ति
 

प्रकटीकृत रामवैभवस्फूर्ति ।
 

दारितदशमुखी
 
खकीर्ति
पुरतो मम भातु हनुमतो मूर्ति ॥ ४ ॥
 
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वानरनिकराध्यक्ष
 

दानवकुलकुमुदरविकर सदृक्षम् ।
 

दीनजनावनदीक्ष
 

पवनतप पाकपुञ्जमद्राक्षम् ॥ ५ ॥
 
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एतत्पवनसुतस्य
 

स्तोत्र <error>य</error><fix>यः</fix> पठति पश्वञ्चरत्नाख्यम् ।
 

चिरमिह निखिलान्भोगा
 

न्
भुङ्क्त्वा श्रीरामभक्तिभाग्भवति ॥ ६ ॥
 
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इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य
 

श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
 

श्रीमच्छकर भगव<error>त</error><fix>तः</fix> कृतौ
 

हनुमत्पश्वरनञ्चर<error>त्न</error><fix>त्नं</fix> सपूर्णम् ॥
 
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