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दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ।
 
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अपारकारुण्यसुधातरङ्गै-

रपाङ्गपातैरवलोकयन्तम् ।
 

कठोर संसारनिदाघ तप्ता-
 

न्मुनीनहं नौमि गुरुं गुरूणाम् ॥ ४ ॥
 
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ममाद्यदेवो वटमूलवासी

कृपाविशेषात्कृतसंनिधानः ।

ओंकाररूपामुपदिश्य विद्या-
 

माविद्यकध्वान्तमपाकरोतु ॥ ५ ॥
 
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कलाभिरिन्दोरिव कल्पिताङ्गं
 

मुक्ताकलापैरिव बद्धमूर्तिम् ।
 

आलोकये देशिकमप्रमेय-
 

मनाद्यविद्यातिमिरप्रभातम् ॥ ६ ॥
 
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स्वदक्षजानुस्थित वामपादं
 

पादोदरालंकृतयोगपट्टम् ।
 

अपस्मृतेराहितपादम
 
ङ्गे
प्रणौमि देवं प्रणिधानवन्तम् ॥ ७ ॥
 
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