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अन्नपूर्णाष्टकम् ।
 
देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी
 
वामा स्वादुपयोधरा प्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।
भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
 
७७
 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ८ ॥
 
चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशी चन्द्रांशुबिम्बाधरी
चन्द्रार्काग्निसमानकुण्डलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।
मालापुस्तकपाशसाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी
 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ९ ॥
 
क्षत्रत्राणकरी महाभयहरी माता कृपासागरी
 
सर्वानन्दकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरी श्रीधरी ।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी
 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ १० ॥
 
अन्नपूर्णे सदापूर्ण
शंकरप्राणवल्लभे ।
 
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं
 
भिक्षां देहि च पार्वति ॥ ११ ॥