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सुवर्णमालास्तुतिः ।
 
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झणुतकझङ्किणुझणुतत्किंकिटतक-

शब्दैर्नटसि महानट भो ।

साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
 

शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २४ ॥
 
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ज्ञानं विक्षेपावृतिरहितं
 

कुरु मे गुरुस्त्वमेव विभो ।

साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
 

शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २५ ॥
 
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टङ्कारस्तव धनुषो दलयति
 

हृदयं द्विषामशनिरिव भो
 

साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
 

शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २६ ॥
 
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ठाकृतिरिव तव माया बहिर -
 

न्तः शून्यरूपिणी खलु भो ।
 

साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
 

शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २७ ॥
 
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