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सुवर्णमालास्तुतिः ।
ओमिति तव निर्देष्ट्री माया -
स्माकं मृडोपकर्त्री भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १२ ॥
औदास्यं स्फुटयति विषयेषु दि-
गम्बरता च तवैव विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १३ ॥
अन्तःकरणविशुद्धिं भक्ति
चत्वसित प्रदेहि विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १४ ॥
अस्तोपाधिसमस्तव्यस्तै
रूपैर्जगन्मयोऽसि विभो
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
1
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १५ ॥
सुवर्णमालास्तुतिः ।
ओमिति तव निर्देष्ट्री माया -
स्माकं मृडोपकर्त्री भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १२ ॥
औदास्यं स्फुटयति विषयेषु दि-
गम्बरता च तवैव विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १३ ॥
अन्तःकरणविशुद्धिं भक्ति
चत्वसित प्रदेहि विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १४ ॥
अस्तोपाधिसमस्तव्यस्तै
रूपैर्जगन्मयोऽसि विभो
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
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शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १५ ॥