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२८०
 
भक्त्याभक्त्या वापि
 
१८३
 
श्लोकानुक्रमणिका ।
 
पृष्ठम्
 
भृङ्गीच्छानटनोत्कटः
 
पृष्ठम्
 
३८
 
भगवन्भर्ग भयापह
 
८८ भ्रमदलिकुलतुल्या०
 
२३१
 
भण्ड भण्डनलीलायां
 
१७४
 
भ्रमरलुलितलोल
 

 
२३१
 
भद्रारूढं भद्रदमारा ०
 
९६
 
भ्रुवौ भुने किंचिद्भ०
 
१३६
 
भवद्गौरवं मल्लघुत्वं
 
१९
 

 
भवानि तव पादाब्ज
 
१७२ मकरन्दझरीमज्ज०
 
१६६
 
भवानि त्वं दासे
 
१३०
 
मन्दाकिनीसलिलचन्दन
 
११९
 
भवानि स्तोतुं त्वां
 
१५९
 
मञ्जीरीभूतभोगिप्रवर०
 
६९
 
भवानी भवानी भवानी
 
२६१
 
मञ्जीरे पदयोर्निधाय
 
२२२
 
भवान्यै भवायापि
 
१९
 
मणिमुकुरे निष्पटले
 
१०९
 
भासा यस्य
 
६६
 
मणिमौक्तिक निर्मितं
 
२१९
 
भास्वन्मौक्तिक तोरणे
 
१०५
 
मणिसदनसमुद्यत्का •
 
१८८
 
भुजंगप्रियाकल्प •
 
२५ मणिस्यूतताटङ्कशो०
 
१५४
 
भुजंगाख्यवृत्तेन
 
१४
 
मत मारो यस्य
 
९८
 
भुजाश्लेषान्नित्यं
 
१४२
 
मद्वश्या ये दुराचारा
 
१७१
 
भूत्यै दृग्भूतयोः
 
६४
 
मधुकरवृतकुम्भ०
 
२३०
 
भूत्यै भवानि त्वां वन्दे
 
१८२
 
मध्यस्थारुणरत्न ०
 
१९७
 
भूदारतामुदवह
 
४४
 
मनस्ते पादाब्जे
 
२७
 
भूम्ना यस्यास्तसीम्ना
 
७०
 
मनस्त्वं व्योम त्वं
 
१३३
 
भूरम्भांस्यनलोऽनिलो ०
 
१०४
 
मनोज्ञरम्भावनखण्ड ०
 
१११
 
भूरिभारघरकुण्डलीन्द्र
 
२४७
 
मन्दं चारणसुन्दरीभिर० २०२