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शिवभुजंगम् ।
 
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१७
 
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विरूपाक्ष विश्वेश विश्वादिदेव
 

त्रयीमूल शंभो शिव त्र्यम्बक त्वम् ।
 

प्रसीद स्मर त्राहि पश्यावमुक्त्यै
 

क्षमां प्राप्नुहि त्र्यक्ष मां रक्ष मोदात् ॥ ८ ॥
 
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महादेव देवेश देवादिदेव
 

स्मरारे पुरारे मारे हरेति ।

ब्रुवाणः स्मरिष्यामि भक्त्या भवन्तं
 

ततो मे दयाशील देव प्रसीद ॥ ९ ॥
 
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त्वदन्यः शरण्यः प्रपन्नस्य नेति
 

प्रसीद स्मरन्नेव हन्यास्तु दैन्यम् ।
 

न चेत्ते भवेद्भक्तवात्सल्यहानि-
 

स्ततो मे दयालो सदा संनिधेहि ॥ १० ॥
 
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अयं दानकालस्त्वहं दानपात्रं
 

भवानेव दाता त्वदन्यं न याचे ।
 

भवद्भक्तिमेव स्थिरां देहि मह्यं
 

कृपाशील शंभो कृतार्थोऽस्मि तस्मात् ॥ ११ ॥
 
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S. N.2
 
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