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त्रिपुरसुन्दरीवेदपादस्तोत्रम् ।
 
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तत्र कामेशवामाङ्के खेलन्तीमलिकुन्तलाम् ।
 

सच्चिदानन्दलहरीं महालक्ष्मीमुपास्महे ॥ १८ ॥
 
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चारुगोरोचनापङ्कजम्बालितघनस्तनीम् ।
 

नमामि त्वामहं लोकमातरं पद्ममालिनीम् ॥ १९ ॥
 
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शिवे नमन्निर्जरकुञ्जरासुर-
 

प्रतोलिका मौलिमरीचिवीचिभिः ।
 

इदं तव क्षालनजातसौभगं
 

चरणं नो लोके सुधितां दधातु ॥ २० ॥
 
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कल्पस्यादौ कारणेशानपि त्री-
 

न्
स्रष्टुं देवि त्रीन्गुणानाद्धानाम ।
 
म् ।
सेवे नित्यं श्रेयसे भूयसे त्वा-
 

मजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम् ॥ २२ ॥
 
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केशोद्भूतैरद्भुतामोदपूरै-
 

राशावृबृन्दं सान्द्रमापूरयन्तीम् ।
 

त्वामानम्य त्वत्प्रसादात्स्वयंभू-
 

रस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् ॥ २२ ॥
 
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