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देवी भुजंगस्तोत्रम् ।
 
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जगत्कर्मधीरान्वचोधूतकीरान्
 

कुचन्यस्तहारान्कृपासिन्धुपूरान् ।

भवाम्भोधिपारान्महापापदूरान्
 

भजे वेदसाराञ्शिवप्रेमदारान् ॥ २४ ॥
 
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सुधासिन्धुसारे चिदानन्दनीरे
 

समुत्फुल्लनीपे सुरत्नान्तरीपे ।
 

मणिव्यूहसाले स्थिते हैमशाले
 

मनोजारिवामे निषण्णं मनो मे ॥ २५ ॥
 
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<verse>दृ
गन्ते विलोला सुगन्धीषुमाला
 

प्रपञ्चेन्द्रजाला विपत्सिन्धुकूला ।
 

मुनिस्वान्तशाला नमल्लोकपाला
 

हृदि प्रेमलीलामृतस्वादुलीला ॥ २६ ॥
 
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जगज्जालमेतत्त्वयैवाम्ब सृष्टं
 

त्वमेवाद्य यासीन्द्रियैरर्थजालम्
 
त्वमे

त्वमेकै
व कर्त्री त्वमेकैव भोक्त्री
 

न मे पुण्यपापे न मे बन्धमोक्षौ ॥ २७ ॥
 
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