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गणेश भुजंगम् ।
 
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विचित्रस्फुरद्रत्नमाला किरीटं

किरीटोल्लसच्चन्द्ररेखाविभूषम् ।
 

विभूषैकभूषं भवध्वंसहेतुं
 

गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥ ४ ॥
 
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उदञ्चद्भुजावल्लरीदृश्यमूलो-
 
ञ्

च्
चलद्भूभ्रूलताविभ्रमभ्राजदक्षम् ।
 

मरुत्सुन्दरीचामरैः सेव्यमानं

गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥ ५ ॥
 
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स्फुरन्निष्ठुरालोलपिङ्गाक्षितारं
 

कृपाको मलोदारलीलावतारम् ।
 

कलाबिन्दुगं गीयते योगिवर्यै-

र्
गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥ ६ ॥
 
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<verse>य
मेकाक्षरं निर्मलं निर्विकल्पं
 

गुणातीतमानन्दमाकारशून्यम् ।
 

परं पारमोंकारमाम्नानायगर्
 
भं
वदन्ति प्रगल्भं पुराणं तमीडे ॥ ७ ॥
 
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