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<subtitle>॥ श्रीः ॥</subtitle>
<title>
॥ अद्वैतपञ्चरत्नम् ॥
 
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नाहं देहो नेन्द्रियाण्यन्तरङ्गो
 

नाहंकारः प्राणवर्गो न बुद्धि:धिः

दारापत्यक्षेत्रवित्तादिदूर:
 
रः
साक्षी नित्यः प्रत्यगात्मा शिवोऽहम् ॥ १ ॥
 
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रज्ज्वज्ञानाद्भाति रज्जौ यथाहि:
 
हिः
स्वात्माज्ञानादात्मनो जीवभावः ।
 

आप्तोक्त्याहि भ्रान्तिनाशे स रज्जु-
 

र्जीवो नाहं देशिकोक्त्या शिवोऽहम् ॥ २ ॥
 
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आभातीदं विश्वमात्मन्यसत्यं
 

सत्यज्ञानानन्दरूपे विमोहात् ।
 

निद्रामोहात्स्वप्नवत्तन्न सत्यं
 

शुद्धः पूर्णो नित्य एकः शिवोऽहं ॥ ३ ॥
 
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