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२७६
 
लोकानुक्रमणिका ।
 
विधिवत्कृतसंन्यासो
 
विधिहरिहरविभेदमप्यखण्डे
 
विद्यते न स्वतः सत्त्वं
 
विद्युद्विलसित चपलं
 
विद्वन्मनोहरा का
 
विराडादित्रयं भाति
 
विपि प्रपञ्च मे
 
विवस्वत्प्रभातं यथारूपमचं
 
विवेकयुक्तबुद्धयाहं
विशुद्धं केवलं ज्ञानं
 
विश्रान्तिमासाद्य तुरीयतल्पे
 
विश्वमात्मानुभवति
 
विश्वादिकत्रयं यस्मि ०
 
विषं दृष्ट्वामृतं दृष्ट्वा
 
विषयेन्द्रिययोर्योगे निमेष ०
विषविषमस्तनयुगलं पाययितुं
 
विस्मृत्यात्मनिवासमुत्कट •
 
वृक्षोत्पन्नफलैर्वृक्षो
 
वृत्तिव्याप्यत्वमेवास्तु
 
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११,
 
वेदवाक्यैरतः किं स्या०
 
वेदान्तवाक्यसंवेद्य •
 
२०१
 
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