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श्लोकानुक्रमणिका ।
 
२६९
 
भूपेन्द्रत्वं प्राप्तमुय ततः किं
 
भेरीमृदङ्गशङ्खाद्याहत ०
 
पृष्ठम्
 
१४८
 
:
 
भोक्त्रा बहिर्यथा भोग्यः
 
भोग्य तमोगुणः प्राहु०
 
२३
 
७३
 
११३
 
मत्तो नान्यत्किचिदत्रास्ति विश्व
 
६०
 
मत्तोऽन्यत्र हि किंचिदस्ति
 
२१४
 
मदिरेव मोहजनकः
 
८८
 
मनश्चक्षुरादेर्वियुक्तः स्वयं यो
 
१७४
 
मनसो यदि वा विषय ०
 
मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाहं
 
मन्त्रैः सर्वः स्तम्भितो वा ततः किं
 
मन्दारपुष्पवासितमन्दा०
 
१५
 
६३
 
१४८
 
085
 
२९
 
मन्मनो मीनवन्नित्यं
 
ममताभिमानशून्यो विषयेषु
 
सर्वे लयं याति
 
मय्यस्मिन्परमार्थके श्रुतिशिरो •
 
भूमौ जलं सर्वे
मातृगुरूदरदय
 
माधुर्य गुडपिष्ठे यत्तत्तस्यां •
मानान्तरोपरोधाच्च
 
...
 
१०८
 
१३
 
...
 
८४
 
२१४
 
...
 
:
 
...
 
४४
 

 
२४
 
१९९