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२६८
 
श्लोकानुक्रमणिका ।
 
बुद्धेः पूर्णविकासोऽयं
 
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या
ब्रह्माण्डानि बहूनि पङ्कज •
 
ब्रह्मादिकं जगत्सर्व
 
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ताः
 
ब्रह्मानन्दे प्रमत्तः स्वा०
 
ब्रह्मैवाहं न संसारी
 
ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं
 
भगवन्किमुपादेयं
भानुस्फुरणतो यद्व०
 
भानोरन्य इवाभाति
 
भानौ तमः प्रकाशत्वा •
भार्या रूपविहीना मनसः
भावाद्वैतं सदा कुर्या ०
भास्यं मेघादिकं भानु •
 
भिन्नप्रवृत्तिहेतुत्वे
भूतभौतिक देहानां
भूतसमत्वं नृहरेः समो
भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमयः
भूत्वा विमुक्तबन्धस्त्वं
 
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