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श्लोकानुक्रमणिका ।
 
पृष्ठम्
 
निर्गतोपाधिराकाश
निद्वैतोऽस्म्यहमस्मि निर्मल ०
 
निवर्तयन्तीं निखिलेन्द्रियाणि
 
निशि वेश्मनि प्रदीपे
निश्वासलोपैर्निभृतैः शरीरै ०
 
निषेधे कृते नेति नेतीति
 
निष्कलोsहं निष्क्रियोऽहं
 
निष्ठरकुठारघातैः काष्ठे
 
निहतः पपात हरिणा
 
नीरात्क्षीरं पृथक्कृत्य
नेत्रे ययोन्मेषनिमेषशून्ये
 
पञ्चाक्षरं पावनमुच्चरन्तः
 
fusaस्तत्र मेघावी
 
६८
 
२१४
 
१२२
 
२१
 
...
 
१२२
 
...
 
१५४
 
२२२
 
२१
 
३५
 
७६
 
१२१
 
...
 
१६०
 
...
 
२०५
 
पथि पतितमस्थि
 
स्पर्श ०
 
पदयोरैक्यबोधस्तु
 
परगृहगृहिणीपुत्रद्रविणा
 
परमानन्दानुभवात्सुचिरं
 

 
परमार्थतो विचारे गुडत •
 
परस्परविरुद्धं स्या०
परिपूर्णस्य नित्यस्य
 
:
 
...
 
११३
 
१३
 
:
 
२३
 
३३
 
१९९
 
५१