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श्लोकानुक्रमणिका ।
 
चिरतरमात्मानुभवादा •
 
चिरमानन्दानुभवात्सु ०
 
चेतः पशुमशुभपथं प्रधाव ०
चेतश्चञ्चलतां विहाय पुरतः
 
छिद्राणां तु निरोधात्सुखेन
 
छिद्रैर्नवभिरुपेतं जीवो
 
जगत्कारणमज्ञान ०
 
जडत्वप्रिय मोदत्वधर्माः
 
जन्तुषु भगवद्भावं भगवति
 
जन्ममृत्युजरादोष •
 
जन्ममृत्युसुखदुःखवर्जितं
 

 
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जलबिन्दुभिराकाशं
जलस्थार्क जलं चोर्मि
 
जलादन्य इवाभाति
 
जले शैत्यादिकं यद्व०
जागरस्वनयोरेव
 
जागरेऽपि धियस्तूष्ण
 
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटतरा
जाग्रदादित्रय यस्मि ०
 
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