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श्लोकानुक्रमणिका ।
 

केयूराद्यैर्भूषितो वा ततः किं
 

केशावधि नखराग्रादिद ०
 

को धन्यः संन्यासी
 

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पृष्ठम्
 
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को नरकः परवशता
 

कोऽनर्थफलो मानः

कोऽन्धो यो कार्यरतः
 

को ब्राह्मणैरुपाय
 

को मायी परमेशः
 

को वर्धते विनीतः
 

क्रियमाणे विलुठने
 

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क्वचिच्छेवैः साथै क्वचिदपि च
 

कचिद्वालैः सार्धं करतलगतालै:
 
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क्वात्मा सच्चिद्रूपः क्व मांस०
 

क्षणे क्षणेऽन्यथाभूता
 

तमुत्पन्नं देहे यदि न
 

वीरनीरविवेकज्ञो
 

वीरयोगाद्यथा नीरं
 

क्षुतद्भ्यां पीडितः प्राणो
 

क्षुत्पिपासान्ध्यबाधिर्य •
 

क्षुद्याविश्व चिकित्स्यतां प्रतिदिनं
 

क्ष्वेलः पीतो दुग्धवद्वा ततः किं
 
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