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श्लोकानुक्रमणिका ।
 
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पृष्ठम्
 
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अइमानन्दसत्यादि ०
 
अहमेव परं ब्रह्म न चाहं
 
अहमेव परं ब्रह्म निश्चितं
 
अहमेव परं ब्रह्म वासुदेवा •
अहिनिर्व्वयनीजातः
अहिनियनीनाशा ०
 
आकर्णपूर्णनेत्रं कुण्डल ०
 
आकाशादन्य आकाश
आकाशाद्वायुरुत्पन्नो
 
आत्मनः
 
आत्मनि स्वप्रकाशानौ
 
आत्मनो ब्रह्मणः सम्यगु०
 
आत्मन्यनुप्रविष्टं चित्तं
 

 
आत्मानं सततं ब्रह्म संभाव्य विहरन्ति
 
आत्मानं सततं ब्रह्म संभाव्य विहरे ०
आत्मा तावदभोक्ता तथैव
आत्मानमञ्जसा वेद्मि
 
आत्मानात्मविवेकेन
 
आत्मानात्मविवेको नो देहस्य
आत्मानात्मविवेचनापि
 
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