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श्लोकानुक्रमणिका ।
 
२४३
 
पृष्ठम्
 
अनयत्पृथुतरशकटं
अनादाविह संसारे
अनाद्यज्ञानमेवात्र
 
अनाहते चेतसि सावधानै ०
 
अनृतं परापवादं रसना
अन्तःस्थभावभोक्ता
 
अन्तरदृष्टे यस्मिञ्जगदि ०
अन्तर्ज्योतिर्बहिज्योंतिः
 
अन्तर्यामिस्वरूपोऽहं
अन्नैर्विप्रास्तर्पिता वा ततः किं
अन्यायमार्थभाजं पश्यति
 
अन्ये तु मायिकजग
 
अन्ये पाषण्डिनः सर्वे
 

 
अन्योऽसावहमन्योऽस्मी •
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां
अपगतगुणवर्णजातिभेदे
 
अपरोक्षयितुं लोके
 
अपेक्ष्यतेऽखिलैर्माने •
 
अभयं सर्वभूतनां
 
अब्धिः पद्भ्यां लङ्घितो वा ततः किं
 
अमी यमीन्द्राः सहजामनस्का०
 
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२०१
 
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१.१९
 
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१४६
 
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२०१
 
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