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२४२
 
श्लोकानुक्रमणिका ।
 
अतीतानागतं किंचि ०
 
पृष्ठम्
 
अतो ब्रह्मात्मविज्ञान ०
 
१०९
 
अतो हि तत्त्वमस्यादि ०
 
२०५
 
अत्यन्तमलिनो देहो
 
१९८
 
अत्र प्रमाणं वेदान्ता
 
१०८
 
૮૪
 
२०२
 
अत्रैव शृणु वृत्तान्त •
अथवा कृष्णाकारां स्वचमूं
अथवा न भिन्नभावः कर्पू ०
अथवा यन्त्रच्छिद्राद्यदा तु
अथाघमर्षणं कुर्या •
 
अदृश्य रूपहीनस्त्वं
अद्वयानन्दरूपात्त्वां
 
अद्वारतुङ्गकुड्ये गृहेऽवरु०
 
अद्वैतानन्दभरात्किमिदं
 
अद्वैते ब्रह्मणि स्थेयं
 
अधिष्ठानं चिदाभासो
 
अधिष्ठानं न जीवः स्या०
 
अध्यस्त चोरजः स्थाणो ०
 
अभ्यस्ताहेरभावेन
 
अध्यस्तो रज्जुसर्पोऽयं
 
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अनन्तं विभुं निर्विकल्पं निरीहं
 
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