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11 : 11
 
॥ श्लोकानुक्रमणिका ॥
 
अकर्ताहमभोक्ताह
 
अक्षिदोषविहीनाना०
 
अक्षिदोषाद्यथैकोऽपि
 
अग्नेर्यथा स्फुलिङ्गाः क्षुदास्तु
 

 
अग्रे गुरुप्रतीतिर्दूरा
अच्युतोऽहमनन्तोऽहं
 
अज्ञानं कारणं साक्षी
 
अज्ञानं चान्यथा लोके
 
अज्ञानं भ्रम इत्याहु •
अज्ञानपङ्कपरिमनमपेतसारं
अज्ञानेन तथात्मा शुद्धोऽपि
 
अज्ञाने बुद्धिविलये
अतस्तयोर्विरुद्धं त०
 
अतिगम्भीरेऽपारे ज्ञान ०
 
S. P. III. 16
 
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