2026-02-24 05:23:05 by ambuda-bot
This page has not been fully proofread.
स्वात्मनिरूपणम् ।
ऋषिरहमृष्यगणोऽहं दृष्टिरहं दृश्यमानमहमेव ।
ऋद्धिरहं वृद्धिरहं तृप्तिरहं तृप्तिदीपदीप्तिरहम् ॥ १११ ॥
४९
एकोऽहमेतदीदृशमेवमितिस्फुरितभेदरहितोऽहम् ।
एष्टव्योऽहमनीहैरन्तः सुकृतानुभूतिभूतोऽहम् ॥ ११२ ॥
ऐक्यावभासकोऽहं वाक्यपरिज्ञानपावनमतीनाम् ।
ऐशमहमेव तत्त्वं नैशतमः प्रायमोहमिहिरोऽहम् ॥ ११३ ॥
ओजोऽहमोषधीनामोतप्रोतायमानभुवनोऽहम् ।
ओंकारसारसोल्लसदात्मसुखामोदमत्तभृङ्गोऽहम् ॥ ११४ ॥
औषधमहमशुभानामौपाधिकधर्मजालरहितोऽहम् ।
औदार्यातिशयोऽहं विविधचतुर्वर्गवितरणपरोऽहम् ॥
अङ्कुशमहमखिलानां महत्तया मत्तवारणेन्द्राणाम् ।
अम्बरमिव विमलोऽहं शम्बररिपुजात विकृतिरहितोऽहम् ॥
अस्तविकल्पमतीनामस्खलदुपदेशगम्यमानोऽहम् ।
अस्थिरसुखविमुखोऽहं सुस्थिरसुखबोधसंपदुचितोऽहम् ॥
करुणारसभरितोऽहं कबलितकमलासनादिलोकोऽहम् ।
कलुषाकृतिविधुरोऽहं कल्मषसुकृतोपलेपरहितोऽहम् ॥
S. P. II. 4
ऋषिरहमृष्यगणोऽहं दृष्टिरहं दृश्यमानमहमेव ।
ऋद्धिरहं वृद्धिरहं तृप्तिरहं तृप्तिदीपदीप्तिरहम् ॥ १११ ॥
४९
एकोऽहमेतदीदृशमेवमितिस्फुरितभेदरहितोऽहम् ।
एष्टव्योऽहमनीहैरन्तः सुकृतानुभूतिभूतोऽहम् ॥ ११२ ॥
ऐक्यावभासकोऽहं वाक्यपरिज्ञानपावनमतीनाम् ।
ऐशमहमेव तत्त्वं नैशतमः प्रायमोहमिहिरोऽहम् ॥ ११३ ॥
ओजोऽहमोषधीनामोतप्रोतायमानभुवनोऽहम् ।
ओंकारसारसोल्लसदात्मसुखामोदमत्तभृङ्गोऽहम् ॥ ११४ ॥
औषधमहमशुभानामौपाधिकधर्मजालरहितोऽहम् ।
औदार्यातिशयोऽहं विविधचतुर्वर्गवितरणपरोऽहम् ॥
अङ्कुशमहमखिलानां महत्तया मत्तवारणेन्द्राणाम् ।
अम्बरमिव विमलोऽहं शम्बररिपुजात विकृतिरहितोऽहम् ॥
अस्तविकल्पमतीनामस्खलदुपदेशगम्यमानोऽहम् ।
अस्थिरसुखविमुखोऽहं सुस्थिरसुखबोधसंपदुचितोऽहम् ॥
करुणारसभरितोऽहं कबलितकमलासनादिलोकोऽहम् ।
कलुषाकृतिविधुरोऽहं कल्मषसुकृतोपलेपरहितोऽहम् ॥
S. P. II. 4