This page has not been fully proofread.

श्लोकानुक्रमणिका ।
 
२८९
 
पृष्ठम्
 
पृष्ठम्
 
यस्य प्रसादादहमेव विष्णु० २५
 
यो बिम्बभूत आनन्दः
 
२०५
 
यस्य प्रसादेन विमुक्तसङ्गाः १४९
यस्येदं सकलं विभाति
 
यो यो दृग्गोचरोऽर्थो
 
८९
 
१९६
 
योऽहं ममेत्याद्य
 

 
२४४
 
यस्यैतद्विद्यते सर्व
 
१२३
 

 
या विषयानन्दो
यावद्यावच्च सद्बुद्धे
 
२०५ रक्षन्प्राणै: कुलायं
 
८८
 
२५७
 
रक्षा तितिक्षासदृशी
 
१२७
 
यावन्न तत्त्वंपदयोः
 
रक्षाविधान शिक्षा
 
५२
 
यावन्न तर्केण
 
२३०
 
रजस्तमश्चैव
 
१८४
 
यावन्नाश्रयते रोगो
 
१४३
 
रजस्तमोभ्यां मलिनं
 
१६१
 
यावान्पिण्डो गुडस्य
 
८४
 
रजोदोषैर्युक्तं
 
१६१
 
युक्त्यात्मानात्मनोः
 
१८५
 
रज्जुरूपे परिज्ञाते
 
१५
 
येन नाराधितो देवो
 
१२२
 
रज्जुसर्पवदात्मानं
 
६०
 
येनानुभूयते सर्व
 
१९७
 
रजो: स्वरूपाधिगमे
 
२११
 
येषां वृत्तिः समावृद्धा
 
१९
 
रजोस्तु तत्त्वमनवेक्ष्य
 
१४७
 
येषामाशा निराशा स्यात् १२०
 
रज्ज्वज्ञानात्क्षणेनैव
 

 
ये हि वृत्तिं जहत्येनां
 
१९
 
रज्ज्वज्ञानाद्भुजङ्गस्त
 
९२
 
ये हि वृत्तिं विजानन्ति
 
१९
 
रज्ज्वादेरुरगाद्यैः
 
४४
 
योगं समारोहति
 
२३८
 
रत्ने यदि शिलाबुद्धिः
 
११६
 
योगमभ्यस्यतो भिक्षोः
 
१२९
 
रवेर्यथा कर्मणि साक्षि०
 
२४९
 
योगारूढस्य सिद्धस्य
 
२३८
 
रागद्वेषभयादीनां
 
२५३
 
यो जागर्ति सुषुप्तिस्थो
 
२५३
 
रागेच्छासुखदुःखादि
 
६०
 
5. P. II. 19