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२८२
 
श्लोकानुक्रमणिका ।
 
पृष्ठम्
 
पृष्ठम्
 
परिपक्क मानसानां
 
४५
 
पुरानुभूतो नो चेत्तु
 
१९७
 
परिपूर्णचिदाकाशे
 
२५१
 
पुरुषत्वं वदत्यस्य
 
१८७
 
परिश्रान्ततया गाढ ०
 
२५२
 
पुरुषत्वेन वै स्थाणुः
 
१२
 
परे ब्रह्मणि तात्पर्य •
 
२२९
 
पुरो दृष्टे हि विषये
 
१७७
 
परोक्षत्वा परोक्षत्वा •
 

 
२२०
 
पूर्ण एव सदाकाशो
 
२१२
 
परोक्षत्वा परोक्षत्वस •
 

 
२२०
 
पूर्णात्मानात्मभेदा०
 
८२
 
पश्यतस्त्वहमेवेदं
 
२२५
 
पोतेन गच्छतः पुंसः
 
१२
 
पश्यन्ति स्वमवलोकं
 
२५२
 
प्रकाशकत्वादेतेषां
 
१५८
 
पश्यन्त्याराममस्य
 
७८
 
प्रकाशोऽर्कस्य तोयस्य
 
६०
 
पायोर्मृत्युरुपस्थस्य
 
१७०
 
प्रचण्डातपमध्यस्थ ०
 
२२८
 
पिण्डीभूतं यदन्त
 
८०
 
प्रतिपदमहमादयो
 
१९९
 
पित्तज्वरार्शः क्षयगुल्म ०
 
१०८
 
प्रत्यत्वपरोक्षत्वे
 
३९
 
पतित्वं हि यथा शुभे
 
१२ प्रत्यक्परोक्षतैकस्य
 
३१
 
पुंसः प्रधानसिद्ध्यर्थं
 
पुंसस्तथानाचरण
 

 
१३७
 
प्रत्यक्प्रत्ययसंतान
 
१२२
 
१२४
 
प्रत्यक्षः सर्वजन्तूनां
 
१८७
 
पुण्यक्षये पुण्यकृतो नभस्यैः १०९
 
प्रत्यक्षादिविरोधः : स्यात्
 
२१६
 
पुत्रमित्रकलत्रादि •
 
१४२
 
प्रत्यक्षाद्यनवगतं
 
४१
 
पुत्रवित्तादयो भावा
 
२८
 
प्रत्यक्षेणानुभूतार्थः
 
१४८
 
पुत्राद्विशिष्टा देहेऽस्मिन् १८६
 
प्रत्यगभिन्नमखण्ड
 
२३८
 
मानजातनिर्वेदो
 
१२१
 
प्रत्यग्बोधो य आभाति
 
३०
 
पुरस्थ एव विषये
 
१७९ प्रत्यग्ब्रह्मविचारपूर्व •
 
१३२