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श्लोकानुक्रमणिका ।
 
२७७
 
पृष्ठम्
 
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त्यागः प्रपञ्चरूपस्य
 
१६
 
दुःखाभावः सुखमिति २०६
 
त्रयमेवं भवेन्मथ्या
 
१०
 
दुःखाभावस्तु लोष्टादौ
 
२०६
 
त्रिपञ्चाङ्गान्यथो वक्ष्ये
 
१५
 
दुःखिनोऽपि सुषुप्तौ त्वा० १९१
 
त्वं प्रत्यस्ताशेषविशेषं
 
२२६
 
दुरदृष्टादिकं नात्र
 
२०४
 
त्वङ्मारुतांशकतया
 
१६९
 
दुष्पारे भवसागरे
 
१४६
 
त्वत्कटाक्षवरचान्द्र ०
 
२४८
 
दूरादवेश्याग्निशिखां
 
११३
 
त्वमेवं निश्चित्य
 
२९
 
Era व्योम्न
 
१७९
 
त्वयापि प्रत्यभिज्ञातं
 
२०६ दृश्यं यद्रूपमेतत्
 
९२
 

 
दग्धृत्वादिकमयसः
 
दृश्यं दृश्यतां नीत्वा
 
२१
 
४६
 
दृश्यते श्रूयते यद्यत्
 
६५
 
दन्तिनि दारूविकारे
 
४६
 
दृश्यधीवृत्तिरेतस्य
 
२५२
 
दमं विना साधु मनः
 
१२६
 
दृश्यन्ते दारुनायें
 
८२
 
दर्शयित्वा सुषुप्तौ तत्
 
२१६
 
दृश्यन्ते येन संदृष्टा
 
२३२
 
दशाचतुष्टयाभ्यासात्
 
२५०
 
दृश्यस्यापि च साक्षित्वात् २३९
 
दहत्यलाभे निःस्वत्वं
 
११७
 
दृष्टः साक्षादिदानीं
 
८५
 
दानं ब्रह्मार्पणं यत्
 
७३
 
तो नैव दृष्टः
 
६९
 
दिग्देशकालाद्यनपेक्ष्य
 
६६
 
दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा
 
१७
 
दिवान्धदृष्टस्तु
 
१५१
 
देवर्षिपितृमर्त्यर्ण •
 

 
१४३
 
दीपाद्दीपो यथा तद्वत्
 
१८६
 
देशकालादिवैशिष्टयं
 
२२०
 
दुःखं च भोगकालेऽपि
 
२०५
 
दुःखप्रत्यय शून्यत्वात्
 
१९१
 
देशिकवरं दयालु
 
देहत्रयातिरिक्तोऽहं
 
३५
 
२५४