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श्लोकानुक्रमणिका ।
 
२७३
 
पृष्ठम्
 
पृष्ठम्
 
छन्द: सिन्धुनिगूढ ०
छायया स्पृष्टमुष्णं वा
 
५०
 
जीवत्वमपि तथेदं
 
४२
 
२४८
 
जीवन्तं जाग्रतीह
 
७७
 

 
जीवन्मुक्तस्तु तद्विद्वान्
 
६३
 
जगत्स्रष्टृत्वपातृत्व
 
2
 
२१४
 
जीवन्मुक्तस्य भगवन्
 
२४९
 
जगदाकारतयापि
 
४५ जीवन्मुक्तिपदं त्यक्त्वा
 
२५४
 
जगद्धेतोस्तु नित्यत्वं
 
१३१
 
जीवन्मुक्तिर्मुमुक्षोः
 
७९
 
जगद्विलक्षणं ब्रह्म
 
६५
 
जीवात्मना प्रवेशश्व
 
२९
 
जडप्रकाशक : सूर्य:
 
१९९
 
जीवात्मब्रह्मभेदं
 
९३
 
जडस्वभावश्चपल:
 
१८९
 
जीवात्मेति परात्मेति
 
२५५
 
जन्मानेकशतैः : सदा०
 
१४४
 
जीवेश्वरेति वाक्ये च
 
२५६
 
जन्मानेकसहस्रेषु
 
१४१
 
ज्ञ
 
जन्मान्तरकृतानन्त
 
१४५
 
ज्ञातज्ञेयः संप्रणम्य
 
२५७
 
जन्मान्तरे मध्यमस्तु
 
१४२
 
ज्ञातृज्ञानज्ञेयभेदः
 
६२
 
जन्मास्तित्वविवृद्धयः
 
१७६ ज्ञातृज्ञानज्ञेयविहीनं
 
२२५
 
जरायुजाण्डजस्वेद ०
 
१७२ ज्ञात्रादिकल्पनाभावात्
 
२३१
 
जलजासनादिगोचर ०
 
५०
 
ज्ञात्रादिभावमुत्सृज्य
 
२३१
 
जले निक्षितलवणं
 
२३१
 
ज्ञात्राद्यविलयेनैव
 
२३०
 
जहदजहतीति सा स्या०
 
३९
 
ज्ञात्वा देवं सर्वपाशा ०
 
२३५
 
जाग्रत्यामन्तरात्मा
 
८५
 
ज्ञानं कर्मणि न स्यात्
 
४३
 
जातं मय्येव सर्व
 
९४
 
ज्ञानं तदेवममलं
 
४४
 
जिह्वाया वरुणो दैवं
 
१६९
 
ज्ञाननिष्ठातत्परस्य
 
२३६
 
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