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२६८
 
श्लोकानुक्रमणिका ।
 
पृष्ठम्
 
पृष्ठम्
 
उत्तम मध्यमश्चैव
 
१२१
 

 
उत्थाने वाप्यनुत्थाने
 
२४३ एककर्ताश्रयौ हस्तौ
 
१३४
 
उत्पन्नेऽप्यात्मविज्ञाने
 
१४
 
एकत्र वृत्तिरर्थे
 
३८
 
उत्पाद्यमाप्यं संस्कार्य
 
१३०
 
एकत्वकथने का वा
 
२१३
 
उदयोऽहमेव
 
४८
 
एकत्वरूपवाक्यार्थो
 
२१९
 
उपरतिशब्दार्थो ह्युप
 
१३७ एकवृत्त्यैव मनसः
 
१२१
 
उपरमयति कर्माणी ०
 
१३०
 
एकश्चन्द्रः स द्वितीय:
 
२११
 
उपलक्षणमस्यापि
 
१६८
 
एकस्तत्रास्त्य सङ्ग
 

 
७५
 
उपलभ्येत केनायं
 
१९७
 
एकाक्यासीत्सपूर्व
 
७६
 
उपादानं प्रपञ्चस्य ब्रह्मणो
 

 
एकादश द्वारवतीह
 
१७४
 
उपादानं प्रपञ्चस्य मृद्भा०
 
१५
 
एकीकृत्य तरङ्गोऽयं
 
२४०
 
उपादानेऽखिलाधारे
 
५८
 
एकीकृत्योच्यते मूर्खे -
 
२४०
 
उपाधियोग उभयोः
 
१७८
 
एको निष्कम्प आत्मा
 
७६
 
उपाधियोगसाम्येऽपि
 
१९८३
 
एको भानुस्तदस्थः
 
८२
 
उपाधिविलयाद्विष्णौ
 
६३
 
एकोऽहमेतदीदृश०
 
४९
 
उपाधिवैशिष्टयकृतो
 
२२१
 
एतत्संशयजातं मे
 
१९४
 
उपाधिस्थोऽपि तद्ध:
 
६३
 
एतत्समष्टिव्यष्टयोचो
 

 
१७५
 

 
एतत्समष्टयवच्छिन्नं
 
१७३
 
ऊर्जस्वलनिजविभवै ०
 
४८
 
१७८
 

 
एतदेवाविविक्तं सदु०
 
१५७
 
ऋषिरमृष्यगणोऽहं
 
४९ एतदैक्यप्रमेयस्य
 
१०४