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ब्रह्मज्ञानफलम्
 

शतश्लोकी
 

सद्गुरोर्निरुपमत्वम्
 

आचार्यमहिमा
 

[ ६ ]
 
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६५
 
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६७-९४
 
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६९
 
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६९
 
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६९
 
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७०
 
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७०
 
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ब्रह्मात्मैक्यानुभवेन प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वसिद्धिः
 

अविवेकिनामात्मस्वरूपाज्ञानेन देहादावात्मबुद्धिः

जीवस्य कीटसाम्येन स्वनिर्मितदेहसाहचर्यम्
 

व्याघ्रादिवेषधारिसाम्येन जीवस्य पृथगनुभवतो ब्रह्मात्मत्वम् ७०
 

बालसाम्येन चेतसो बोधोपायैरुपनिषदा बोधनम्
 
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आत्मन एव प्रियत्वम्
 

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७१
 
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७१
 
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काम्यप्रियाह्मण आत्यन्तिकप्रियत्वमित्यत्र कठोपनिष-
 

त्संवादः
 

यावज्जीवं ब्रह्मात्मैक्यभावनावानन्तर्निष्ठः
 

वैराग्यस्य प्रव्रज्यायाश्च द्वैविध्यम्
 

गृहस्थस्य मोक्षोपायः
 

देहात्मबुद्धीनां दुःखानुभवः
 

द्विविधा प्रव्रज्या
 

पातहेतुकामक्रोधलोभानां त्याज्यत्वम्
 

तत्र कल्माषसामसंवादः
 

देवातिथिपूजनम्
 

ब्रह्मणो जगदुपादानत्वम्
 
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