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२९८
 
श्लोकानुक्रमणिका ।
 
पृष्ठम्
 
स्वामित्वद्योतनायास्मि ०
 
पृष्ठम्
 
स्ववर्णाश्रमधर्मेण
 

 
१८७
 
स्ववासनाप्रेरित एव
 
१६० स्वीकुर्वन्व्याघ्रवेपं
 
७०
 
स्वविकारं परित्यज्य
 
१२१
 
:
 
स्वीयैः परैस्ताडनमज्ञ ०
 
१०७
 
स्वस्वरूपे मनः स्थान ० २३७
 
स्वेदाज्जाताः स्वेदजास्ते
 
१७२
 
स्वस्वोपाधिलयादेव
 
२५६
 
स्वेनानुभूतं स्वयमेव
 
१९६
 
स्वस्वोपाध्यनुरूपेण
 
२०७
 

 
स्वाज्ञानज्ञानहेत्
 
७४
 
हव्यमहं कव्यमहं
 
५३
 
स्वात्मतत्त्वं समालम्ब्य
 
२३५
 
हस्तवयमेतस्य
 
१३३
 
स्वात्मन्यनस्तमय ०
 
२२४
 
हितपरिमितभोजी
 
१६३
 
स्वात्मानं शृणु मूर्ख त्वं
 
67
 
हित्वा द्वौ शबलौ वाच्यौ ३०
 
स्वात्मैकचिन्तनं यत्त०
 
१२५ हिरण्यगर्भः सूत्रात्मा
 
१६६
 
स्वानुभूतिं परित्यज्य
 
२४४
 
हिरण्यगर्भ इत्यस्य
 
१६६
 
स्वापरोक्षस्य वेदादेः
 
१३६ हुताशनानां शशिना ०
 
१४६
 
स्वाप्नस्त्रीसङ्गसौख्यादपि
 
७८
 
हृदाकाशोदितो ह्यात्मा
 
६५
 
स्वाभाविकं यदि
 
४२ हेतुः कर्मैव लोके
 
८९
 
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ग्रन्थालय, के, स. ति. शि संस्थान)
 
सारनाथ, वाराणसी