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२९४
 
लोकानुक्रमणिका ।
 
श्लेष्मोद्गारिमुखं
 
पद्मावविरहितोऽहं
 

 
पृष्ठम्
 
श्रोत्रियो ब्रह्मनिष्ठः
 
१४४
 
संसारदाव पावक
 

 
११२ संसारबन्धनिर्मुक्तिः कथं
 
पृष्ठम्
३५
 

 
संसारबन्धनिर्मुक्तिः कदा १२५
 
५२
 
संसारमृत्योर्बलिनः
 
१२०
 
षड्भूमिकाचिराभ्यासात् २५०
 
स एव सद्यस्तरति
 
१४२
 

 
सच्चिदात्मन्यनुस्यूते
 
५८
 
संकल्पवानहं चिन्ता •
 
१८९
 
सच्चिन्तनस्य संबाधो
 
१२५
 
संकल्पानुदये हेतुः
 
११६
 
सजातीयप्रवाहश्व
 
१६
 
संकल्पान्मन इत्याहुः
 
१५९
 
सतामपि पदार्थस्य
 
११७
 
संघातोऽपि तथा नाहं
 
२७
 
सति कोशशक्त्युपाधौ
 
३७
 
संजाताहंकृतित्यागः
संधौ जाग्रत्सुषुप्त्यो •
 
१२४
 
सति तमसि मोहरूपे
 
५४
 
८८
 
सति प्रपञ्चे जीवे वा
 
२१७
 
संन्यस्य तु यतिः कुर्यात्
 
१३७
 
सति सकलदृश्यबाधे
 
३७
 
संन्यसेत्सुविरक्तः स्यात्
 
१३७
 
सतो भिन्नमभिन्नं वा
 
१५४
 
संपन्नोऽन्धवदेव
 
११८
 
सत्कर्मक्षयपाप्मनां
 
१२०
 
संप्रीतिमक्ष्णोर्वदन०
 
१४५
 
सत्यं जगदिति भानं
 
४५
 
संबन्धानुपपत्त्या च
 
२१७
 
सत्यं ज्ञानमनन्तं
 
४३
 
संयोज्य स्थूलतां यान्ति
 
१६७
 
सत्यं निर्ममता स्थैर्य
 
१२३
 
संवित्सुखात्मकोऽहं
 
५२
 
सत्यमाह भवानत्र
 
२६
 
संसर्गे वा विशिष्ट वा
 
३०
 
सत्यमित्युच्यते ब्रह्म
 
१२४
 
संसारः स्वनतुल्यो हि
 
५८
 
सत्यर्थेऽपि च नोदेति
 
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