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श्लोकानुक्रमणिका ।
 
२८३
 
पृष्टम्
 
पृष्टम्
 
सुखादेर्नात्मधर्मत्वं
 
१९६
 
स्वप्ने दुःख्यमध्यासं
 
२३४
 
मुदुस जाग्रत्स्वपतश्च
 
१६४
 
स्वभावशुद्धे गगने
 
ነረ
 
सुदुसवजाग्रति
 
१६६
 
स्वमिवैकरसा ज्ञतिः
 
१८४
 
मुमुत्याख्यं तमोऽज्ञानं
 
२०३
 
स्वयं ज्योतिर्न हि द्रष्टुः
 
२२३
 
सूक्ष्मताव्यापिते ज्ञेये
 
१६२
 
स्वयं लब्धस्वभावत्वात्
 
२००
 
सूक्ष्मैकागोचरेभ्यश्च
 
१९७
 
स्वयंवेद्यत्व पर्यायः
 
२३६
 
सनं सर्वव्यवस्थानां
 
२०९
 
स्वयमेवावभास्यन्ते
 
२२०
 
सेत्स्यतीत्येव चेत्तत्स्यात् २३७
 
स्वरूप चात्मनो ज्ञानं
 
२१९
 
सोऽध्यासो नेति नेतीति
 
२१४
 
स्वरूपत्वान्न सर्वस्य
 
१९५
 
सोपाधिश्चैवमात्मोक्तो
 
१८६
 
स्वरूपस्यानिमित्तत्वात्
 
१९५
 
स्थानावच्छेददृष्टिः
 
१९२ स्वरूपाव्यवधानाभ्यां
 
ነረረ
 
स्थावरं जङ्गमं चैव
 
१७८
 
स्वसाक्षिकं ज्ञानम्
 
१९८
 
स्थिती दीपो यथायन:
 
१९०
 
स्वाकारान्यावभास्यं
 
१९३
 
२२८
 
स्यात्मबुद्धिमपेश्यासौ
 
ገረ
 
स्मरतो दृश्यते दृष्टं १८३
 
स्वार्थस्य प्रहाणेन
 
२३२
 
स्यान्मालापरिहार्यातु
 
१९७
 

 
स्वप्नः सत्यो यथाबोधात् १६७
 
हन्त तहिं न मुख्यार्थी
 
२१८
 
स्वप्नस्मृत्योर्घटादेहिं
 
१७५
 
हित्वा जात्यादिसंबन्धं
 
२.९
 
स्वनं तद्वत्प्रबोधे यो
 
२०२
 
हूयन्ते तु हवीपति
 
१८५
 
=-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGang