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लोकानुक्रमणिका ।
 
२८१
 
पृष्ठम्
 
पृष्ठम्
 
निर्विकारं निराकारं
निर्विकारतया वृत्त्या
 
२४३
 
नैव प्रत्यग्जायते वर्धते नो १७६
 
१८
 
नैवान्यसाधनापेक्षा
 
१३३
 
निर्विकारो निराकारो
 

 
नैवास्ति काचन भिदा
 
२२२
 
निर्विशेषं निराभासं नि० २४३
 

 
निर्विशेषं निराभासम ०
 
२२०
 
पक्षाभ्यस्य पक्षी
 
८६
 
निपध्य निखिलोपाधीन्
 
६१
 
पञ्चकोशादियोगेन
 
५९
 
निषेधनं प्रपञ्चस्य
 
१८ पञ्चप्राणमनोबुद्धि
 

 
५८
 
निष्कलं निष्क्रियं शान्तं
 
१३१
 
पञ्चानामेव भूतानां
 
१६४
 
निष्कलङ्क निरातङ्कं
 
२४३
 
पञ्चीकृतमहाभूत
 
C
 
५८
 
frgaafना पात्रं
 
१४२
 
पञ्चीकृतेभ्यः स्वादिभ्यः
 
:
 
१७२
 
नृजन्म जन्तोरतिदुर्लभं
 
१४२
 
पदान्तरेण सिद्धायां
 
२१९
 
नेति नेतीत्यरूपत्वात्
 
२५६ पदार्थमेव जानामि
 
२६
 
नेष्यते तत्प्रकारं ते
 
२०८
 
परजीवभेदबाधक ०
 
५१
 
नोऽस्मादाद्रमेधः
 
:
 
७९
 
परत्र पूर्वदृष्टस्य
 
१७७
 
नोत्पद्यते विना ज्ञानं
 

 
परद्रव्यपरद्रोह
 
°
 
१६२
 
नोदेति नास्तमायाति
 
२५३
 
परप्रयुक्तेन चिर०
 
२५०
 
नो देहो नेन्द्रियाणि
 
९२ परप्रेमास्पदतया
 
२८
 
नैकधी विषयत्वेन
 
१६६
 
परब्रह्मवदाभाति
 
२५२
 
नैतदन्यतरं ब्रह्म
 
१३०
 
परस्परविरुद्धत्वात्
 
२३६
 
तस्मात्कर्मणः कार्य
 
१८४
 
परित्यज्य विरुद्धांश
 
२२०
 
नैवेद्यं ज्ञानगर्भ
 
७२
 
परिपक्कं मनो येषां
 
२१