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५८४
 
श्रीमद्भगवद्गीता
 
पृष्टम्
 
पृष्टम्
 
न रूपमस्येह तथो
 
४३४
 
निश्चयं शृणु मे तल
 
४९१
 
न वेदयज्ञाध्ययनैः
 
३३१. निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः
 
१०
 
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा
 
५६८
 
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति
 
४९
 
न हि कश्चित्क्षणमपि
 
८६ नैते सृती पार्थ जानन्
 
२४९
 
न हि ज्ञानेन सदृशं
 
१४४
 
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि
 
४०
 
न हि देहभृता शक्यं
 
४९८
 
नैव किंचित्करोमीति
 
१.६१.
 
न हि प्रपश्यामि ममा०
 
१६ .
 
नैव तस्य कृतेनार्थो
 
९३
 
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति
 
१९३
 

 
नादत्ते कस्यचित्पापं
 
१६६
 
पञ्चैतानि महाबाहो
 
५००
 
नान्तोऽस्ति मम दि०
 
२९७
 
पत्रं पुष्पं फलं तोयं
 
२७०
 
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं
 
४२१
 
परं ब्रह्म परं धाम
 
२८५
 
नासतो विद्यते भावः
 
२७
 
परं भूयः प्रवक्ष्यामि
 
४११
 
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य
 
६६
 
परस्तस्मात्तु भावोऽन्यो
 
२४५
 
नाहं प्रकाशः सर्वस्य
 
. २२६. परित्राणाय साधूनां
 
१.१५
 
नाहं वेदैर्न तपसा
 
३३४ पवनः पवतामस्मि
 
२९२
 
निमित्तानि च पश्यामि
 

 
पश्य मे पार्थ रूपाणि
 
३०३.
 
नियतं कुरु कर्मत्वं
 
८७
 
पश्यादित्यान्वसुः
 
३०३
 
नियतं सङ्गरहितं
 
५१०
 
पश्यामि देवांस्तव देव
 
३०८.
 
नियतस्य तु संन्यास:
 
४९४
 
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणां
 

 
निराशीर्यतचित्तात्मा
 
१२९
 
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो
 

 
निर्मानमोहा जितसङ्ग •
 
४३६
 
पार्थ नैवेह नामुत्र
 
२०६