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२२८
 
Stanza
 
उदग्रा यौवनयोगाः
 
उदन्वच्छन्नाभूः स
 
उदयति यदि भानुः
उदयस्थः सहस्रांशुर्दृष्टे
उदासीनो देवो मंदन-
उदीरितोऽर्थः पशुना
उदेति घनमण्डली
(उद्गादप्रेमसंरम्भा )
(उद्घाटिना खिलखल- )
उद्भासिता खिलखल
उद्यमं कुर्वतां पुंसां
उद्यानेषु विचित्रभोज
 
उद्वृत्तस्तनभार एप
उन्मत्तप्रेमसंरम्भादा-
उन्मील त्रिवलीतरङ्ग-
( उन्मीलितनयनानां )
 
( उपचरितव्याः मन्तो )
 
उपदेशो हि मूर्खाणां
उपरि घनं घनपटलं
 
( उपरि निपतितानां )
 
( उपाया: सन्त्येते विर)
उरभि निपतितानां
उगे मासदये जाते
उष्णमन्नं घृतं मद्यं
 
एक एव वगो मानी
 
एक एवं सतां दोषो
 
( एकस्मादिर मेन्द्रियार्थ )
 
एकाकी निःस्पृहः शान्तः
 
एकान्त शीलस्य दृढव्रत-
(एकाश्चलद्वलयसंहनि-)
एकेनापि हि शूरेण
एके सत्पुरुषाः परार्थ
एकैव काचिन्महतां
एको देवः केशवो वा
 
शको रागिषु राजते
( ए को वासः पत्तने वा )
एतत्कामफलं लोके
एतस्मात्कथमिन्द्रजाल
एतस्माद्विरमेन्द्रियार्थ
एतस्याः स्तनभारभद्गुर
एताश्चलद्वलय संहति
एतानि तानि नवयौ
 
एता हसन्ति च रुद्
एते ते दिवसास्त एव
 
( एते सत्पुरुषाः परा )
 
ऐश्वर्य तिमिरं चक्षुः
 
भर्तृहरिसुभाषितसंग्रहस्य
 
No.
 
४२५
 
२१९
 
४२६
 
१२
 
६५
 
४२७
 
४२८
 
११५
 
६९
 
६९
 
४२९
 
४३०
 
११९
 
११५
 
१०१
 
२१५
 
५९६
 
४३१
 
>
 
१२३
 
८३
 
१२३
 
४३२
 
८५२
 
४३३
 
४३४
 
१८०
 
१८५
 
४३५
 
Co
 
२२०
 
२२१
 
२२२
 
२२३
 
२२४
 
२२२
 
२२५
 
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१८०
 
४२७
 
८०
 
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४३९
 
४४०
 
२२१
 
८२७
 
Stanza
 
ऐश्वर्यस्य विभूषणं
 
१४८
 
ॐकारे सत्प्रवीपे
 
२०६ (, , )
 
२२०
 
१४८
 
१४८
 
४६
 
२८
 
Page
 
१४८
 
८७
 
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१४०
 
४८
 
३३
 
४८
 
१४९
 
२०५
 
क आलप्तः प्रिया:
 
कक्षे किं मिनपुस्तकं
 
कस्यापि हि
 
कदा गोविन्देति प्रति
 
कदाचित्कष्टेन द्रविण
 
कद्रा भागीरथ्या भव
 
कदा मिक्षाभक्षैः
 
कढा वाराणस्याममर-
१४९
 
७१
 
१५०
 
३२
 
१५०
 
१५०
 
१५०
 
८७
 
कन्थासंचरणं कदन्न
 
कपिकुलन खमुख
 
( कमठकुलाचल दिग्गज )
 
कमलवदना पीनजङ्ग
 
( करिणांवेधा दर्दीपित ) :
 
करे लाव्यस्त्यागः
 
कर्तव्यं न करोति
 
कर्मायत्तं फलं पुंसा
 
कलिलं चैकसत्रेण
 
कलौं गङ्गा काइयां
 
कल्पान्तपवना वान्तु
 
कश्चित्कन्दति काल-
१४९ । कुश्चम्बंति कुलपुरुषो
१४९ ६ स्ये माँ पितरों
 
७१
 
कः कालः कानि मित्रा-
७८ काचिन्मृगाक्षी प्रिय-
१४९
 
। कान्ताकटाक्षविशिखा
 
३२ कान्तेत्युत्पललोचनेति
 
८७ । कामव्याघ्रे कुमति
 
८७
 
कामस्यापि निधान
 
८८ । कामादित्रिकमेव
 
८८
 
८८
 
८८
 
M
 
कामिनश्चरितैरेभिः
 
कामिनीकायकान्तारे
 
( कारणत्वमकारण )
 
कार्कश्यं स्तनयोदृशो
कावेरीतीरभूमीरुह-
काशीयं समलंकृता
 
(कति विद्या)
 
( किं कन्दर्प करं कदर्थ-)
 
किं कन्दाः कन्दरेभ्यः
 
किं कन्दा कन्दरेभ्यः
 
किं कर्पूरः किमु मलय-
किं कुर्म: किं भजामः
 
२०३ । किं कुर्मस्य भरव्यथा
 
No.
 
४१
 
४४१
 
४६१
 
१८
 
८४१
 
२२६
 
२३
 
२०
 
२२
 
४४२
 
२२७
 
४४३
 
४४४
 
५२८
 
६०
 
१४१
 
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८३
 
२२८
 
४४५
 
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९३
 
२२९
 
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४४८
 
२३०
 
२३१
 
३७
 
८५
 
९७
 
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४५०
 
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Page
 
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२२२
 
१५१
 
१५१
 
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१५२
 
२१६
 
९१