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Reports » rAmAyaNam

Updated 2026-02-22 23:41

XML

XML conforms to the TEI schema ✓ Passed (18762/18762)
<text> @xml:id matches text's slug ✓ Passed (1/1)
All <div> elements set 'n' with unique values ✓ Passed (606/606)
Singleton <head> and <trailer> slugs end with .head / .trailer — N/A (0/0)
All blocks have unique identifiers ✓ Passed (18761/18761)
Verse-only texts: <lg> slugs do not contain 'lg' ✓ Passed (18761/18761)

Text

Devanagari text is well-formed ✓ Passed (56804/56804)
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Verse numbers match `n` attribute ✓ Passed (18761/18761)

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Verse 1.1.79
<lg xml:id="R.1.1.79" n="1.1.79">
  <l>पठन्द्विजो वागृषभत्वमीयात्स्यात्क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात् ।</l>
  <l>वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयाज्जनश्च शूद्रोऽपि महत्त्वमीयात् ॥ ७९ ॥</l>
</lg>
प
L
ठ
G
न्द्वि
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जो
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वा
G
गृ
L
ष
L
भ
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त्व
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मी
G
या
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त्स्या
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त्क्ष
G
त्रि
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यो
G
भू
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L
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ति
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मी
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G
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G
ग्ज
L
नः
G
प
G
ण्य
L
फ
L
ल
G
त्व
L
मी
G
या
G
ज्ज
L
न
G
श्च
L
शू
G
द्रो
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पि
L
म
L
ह
G
त्त्व
L
मी
G
यात्
G
Verse 1.5.23
<lg xml:id="R.1.5.23" n="1.5.23">
  <l>तामग्निमद्भिर्गुणवद्भिरावृतां द्विजोत्तमैर्वेदषडङ्गपारगैः ।</l>
  <l>सहस्रदैः सत्यरतैर्महात्मभिर्महर्षिकल्पैरृषिभिश्च केवलैः ॥ २३ ॥</l>
</lg>
ता
G
म
G
ग्नि
L
म
G
द्भि
G
र्गु
L
ण
L
व
G
द्भि
L
रा
G
वृ
L
तां
G
द्वि
L
जो
G
त्त
L
मै
G
र्वे
G
द
L
ष
L
ड
G
ङ्ग
L
पा
G
र
L
गैः
G
स
L
ह
G
स्र
L
दैः
G
स
G
त्य
L
र
L
तै
G
र्म
L
हा
G
त्म
L
भि
G
र्म
L
ह
G
र्षि
L
क
G
ल्पै
G
रृ
L
षि
L
भि
G
श्च
L
के
G
व
L
लैः
G
Verse 1.6.24
<lg xml:id="R.1.6.24" n="1.6.24">
  <l>तां सत्यनामां दृढतोरणार्गलाम्गृहैर्विचित्रैरुपशोभितां शिवाम् ।</l>
  <l>पुरीमयोध्यां नृसहस्रसंकुलां शशास वै शक्रसमो महीपतिः ॥ २४ ॥</l>
</lg>
तां
G
स
G
त्य
L
ना
G
मां
G
दृ
L
ढ
L
तो
G
र
L
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G
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L
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G
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L
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G
र्वि
L
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G
त्रै
G
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L
प
L
शो
G
भि
L
तां
G
शि
L
वाम्
G
पु
L
री
G
म
L
यो
G
ध्यां
G
नृ
L
स
L
ह
G
स्र
L
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G
कु
L
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G
श
L
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G
स
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वै
G
श
G
क्र
L
स
L
मो
G
म
L
ही
G
प
L
तिः
G
Verse 1.7.17
<lg xml:id="R.1.7.17" n="1.7.17">
  <l>तैर्मन्त्रिभिर्मन्त्रहितैर्निविष्टैर्वृतोऽनुरक्तैः कुशलैः समर्थैः ।</l>
  <l>स पार्थिवो दीप्तिमवाप युक्तस्तेजोमयैर्गोभिरिवोदितोऽर्कः ॥ १७ ॥</l>
</lg>
तै
G
र्म
G
न्त्रि
L
भि
G
र्म
G
न्त्र
L
हि
L
तै
G
र्नि
L
वि
G
ष्टै
G
र्वृ
L
तो
G
नु
L
र
G
क्तैः
G
कु
L
श
L
लैः
G
स
L
म
G
र्थैः
G
स
L
पा
G
र्थि
L
वो
G
दी
G
प्ति
L
म
L
वा
G
प
L
यु
G
क्त
G
स्ते
G
जो
G
म
L
यै
G
र्गो
G
भि
L
रि
L
वो
G
दि
L
तो
G
र्कः
G
Verse 1.13.31
<lg xml:id="R.1.13.31" n="1.13.31">
  <l>हयस्य यानि चाङ्गानि तानि सर्वाणि ब्राह्मणाः ।</l>
  <l>अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत्समस्ताः षोडशर्त्विजः ॥ ३१ ॥</l>
</lg>
ह
L
य
G
स्य
L
या
G
नि
L
चा
G
ङ्गा
G
नि
L
ता
G
नि
L
स
G
र्वा
G
णि
G
ब्रा
G
ह्म
L
णाः
G
अ
G
ग्नौ
G
प्रा
G
स्य
G
न्ति
L
वि
L
धि
L
व
G
त्स
L
म
G
स्ताः
G
षो
G
ड
L
श
G
र्त्वि
L
जः
G
Verse 1.13.33
<lg xml:id="R.1.13.33" n="1.13.33">
  <l>त्र्यहोऽश्वमेधः संख्यातः कल्पसूत्रेण ब्राह्मणैः ।</l>
  <l>चतुष्टोममहस्तस्य प्रथमं परिकल्पितम् ॥ ३३ ॥</l>
</lg>
त्र्य
L
हो
G
श्व
L
मे
G
धः
G
सं
G
ख्या
G
तः
G
क
G
ल्प
L
सू
G
त्रे
G
ण
G
ब्रा
G
ह्म
L
णैः
G
च
L
तु
G
ष्टो
G
म
L
म
L
ह
G
स्त
G
स्य
G
प्र
L
थ
L
मं
G
प
L
रि
L
क
G
ल्पि
L
तम्
L
Verse 1.14.18
<lg xml:id="R.1.14.18" n="1.14.18">
  <l>राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो ।</l>
  <l>धर्मज्ञस्य वदान्यस्य महर्षिसमतेजसः ।</l>
  <l>तस्य भार्यासु तिसृषु ह्रीश्रीकीर्त्युपमासु च ।</l>
  <l>विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वात्मानं चतुर्विधम् ॥ १८ ॥</l>
</lg>
रा
G
ज्ञो
G
द
L
श
L
र
L
थ
G
स्य
G
त्व
L
म
L
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G
ध्या
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L
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L
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L
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G
ध
G
र्म
G
ज्ञ
G
स्य
L
व
L
दा
G
न्य
G
स्य
L
म
L
ह
G
र्षि
L
स
L
म
L
ते
G
ज
L
सः
G
त
G
स्य
L
भा
G
र्या
G
सु
L
ति
L
सृ
L
षु
G
ह्री
G
श्री
G
की
G
र्त्यु
L
प
L
मा
G
सु
L
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L
वि
G
ष्णो
G
पु
G
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G
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L
मा
G
ग
G
च्छ
L
कृ
G
त्वा
G
त्मा
G
नं
G
च
L
तु
G
र्वि
L
धम्
L
Verse 1.16.20
<lg xml:id="R.1.16.20" n="1.16.20">
  <l>तैर्मेघवृन्दाचलकूटकल्पैर्महाबलैर्वानरयूथपालैः ।</l>
  <l>बभूव भूर्भीमशरीररूपैः समावृता रामसहायहेतोः ॥ २० ॥</l>
</lg>
तै
G
र्मे
G
घ
L
वृ
G
न्दा
G
च
L
ल
L
कू
G
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L
क
G
ल्पै
G
र्म
L
हा
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ब
L
लै
G
र्वा
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न
L
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L
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G
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लैः
G
ब
L
भू
G
व
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म
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री
G
र
L
रू
G
पैः
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स
L
मा
G
वृ
L
ता
G
रा
G
म
L
स
L
हा
G
य
L
हे
G
तोः
G
Verse 1.17.33
<lg xml:id="R.1.17.33" n="1.17.33">
  <l>यथामृतस्य संप्राप्तिर्यथा वर्षमनूदके ।</l>
  <l>यथा सदृशदारेषु पुत्रजन्माप्रजस्य च ।</l>
  <l>प्रनष्टस्य यथा लाभो यथा हर्षो महोदये ।</l>
  <l>तथैवागमनं मन्ये स्वागतं ते महामुने ॥ ३३ ॥</l>
</lg>
य
L
था
G
मृ
L
त
G
स्य
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प्रा
G
प्ति
G
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G
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L
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L
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G
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G
षु
L
पु
G
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G
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L
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L
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G
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L
म
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म
G
न्ये
G
स्वा
G
ग
L
तं
G
ते
G
म
L
हा
G
मु
L
ने
G
Verse 1.47.23
<lg xml:id="R.1.47.23" n="1.47.23">
  <l>गौतमं स ददर्शाथ प्रविशन्तं महामुनिम् ।</l>
  <l>देवदानवदुर्धर्षं तपोबलसमन्वितम् ।</l>
  <l>तीर्थोदकपरिक्लिन्नं दीप्यमानमिवानलम् ।</l>
  <l>गृहीतसमिधं तत्र सकुशं मुनिपुङ्गवम् ॥ २३ ॥</l>
</lg>
गौ
G
त
L
मं
G
स
L
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G
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L
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G
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L
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G
त
G
त्र
L
स
L
कु
L
शं
G
मु
L
नि
L
पु
G
ङ्ग
L
वम्
L
Verse 1.64.6
<lg xml:id="R.1.64.6" n="1.64.6">
  <l>न ह्यस्य वृजिनं किंचिद्दृश्यते सूक्ष्ममप्यथ ।</l>
  <l>न दीयते यदि त्वस्य मनसा यदभीप्सितम् ।</l>
  <l>विनाशयति त्रैलोक्यं तपसा सचराचरम् ।</l>
  <l>व्याकुलाश्च दिशः सर्वा न च किंचित्प्रकाशते ॥ ६ ॥</l>
</lg>
न
G
ह्य
G
स्य
L
वृ
L
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G
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G
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G
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ते
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L
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L
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स
G
र्वा
G
न
L
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L
किं
G
चि
G
त्प्र
L
का
G
श
L
ते
G
Verse 2.2.34
<lg xml:id="R.2.2.34" n="2.2.34">
  <l>तं देवदेवोपममात्मजं ते सर्वस्य लोकस्य हिते निविष्टम् ।</l>
  <l>हिताय नः क्षिप्रमुदारजुष्टं मुदाभिषेक्तुं वरद त्वमर्हसि ॥ ३४ ॥</l>
</lg>
तं
G
दे
G
व
L
दे
G
वो
G
प
L
म
L
मा
G
त्म
L
जं
G
ते
G
स
G
र्व
G
स्य
L
लो
G
क
G
स्य
L
हि
L
ते
G
नि
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वि
G
ष्टम्
L
हि
L
ता
G
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L
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G
क्षि
G
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L
मु
L
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G
र
L
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G
ष्टं
G
मु
L
दा
G
भि
L
षे
G
क्तुं
G
व
L
र
L
द
G
त्व
L
म
G
र्ह
L
सि
L
Verse 2.3.32
<lg xml:id="R.2.3.32" n="2.3.32">
  <l>ते चापि पौरा नृपतेर्वचस्तच्छ्रुत्वा तदा लाभमिवेष्टमाप्य ।</l>
  <l>नरेन्द्रमामन्त्य गृहाणि गत्वा देवान्समानर्चुरतीव हृष्टाः ॥ ३२ ॥</l>
</lg>
ते
G
चा
G
पि
L
पौ
G
रा
G
नृ
L
प
L
ते
G
र्व
L
च
G
स्त
G
च्छ्रु
G
त्वा
G
त
L
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G
ला
G
भ
L
मि
L
वे
G
ष्ट
L
मा
G
प्य
L
न
L
रे
G
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L
मा
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म
G
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L
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G
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G
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G
वा
G
न्स
L
मा
G
न
G
र्चु
L
र
L
ती
G
व
L
हृ
G
ष्टाः
G
Verse 2.11.14
<lg xml:id="R.2.11.14" n="2.11.14">
  <l>विशुद्धभावस्य हि दुष्टभावा ताम्रेक्षणस्याश्रुकलस्य राज्ञः ।</l>
  <l>श्रुत्वा विचित्रं करुणं विलापं भर्तुर्नृशंसा न चकार वाक्यम् ॥ १४ ॥</l>
</lg>
वि
L
शु
G
द्ध
L
भा
G
व
G
स्य
L
हि
L
दु
G
ष्ट
L
भा
G
वा
G
ता
G
म्रे
G
क्ष
L
ण
G
स्या
G
श्रु
L
क
L
ल
G
स्य
L
रा
G
ज्ञः
G
श्रु
G
त्वा
G
वि
L
चि
G
त्रं
G
क
L
रु
L
णं
G
वि
L
ला
G
पं
G
भ
G
र्तु
G
र्नृ
L
शं
G
सा
G
न
L
च
L
का
G
र
L
वा
G
क्यम्
L
Verse 2.14.24
<lg xml:id="R.2.14.24" n="2.14.24">
  <l>स राघवस्तत्र कथाप्रलापं शुश्राव लोकस्य समागतस्य ।</l>
  <l>आत्माधिकारा विविधाश्च वाचः प्रहृष्टरूपस्य पुरे जनस्य ॥ २४ ॥</l>
</lg>
स
L
रा
G
घ
L
व
G
स्त
G
त्र
L
क
L
था
G
प्र
L
ला
G
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G
शु
G
श्रा
G
व
L
लो
G
क
G
स्य
L
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ग
L
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G
स्य
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G
त्मा
G
धि
L
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G
रा
G
वि
L
वि
L
धा
G
श्च
L
वा
G
चः
G
प्र
L
हृ
G
ष्ट
L
रू
G
प
G
स्य
L
पु
L
रे
G
ज
L
न
G
स्य
L
Verse 2.14.25
<lg xml:id="R.2.14.25" n="2.14.25">
  <l>एष श्रियं गच्छति राघवोऽद्य राजप्रसादाद्विपुलां गमिष्यन् ।</l>
  <l>एते वयं सर्वसमृद्धकामा येषामयं नो भविता प्रशास्ता ।</l>
  <l>लाभो जनस्यास्य यदेष सर्वं प्रपत्स्यते राष्ट्रमिदं चिराय ॥ २५ ॥</l>
</lg>
ए
G
ष
G
श्रि
L
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G
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G
च्छ
L
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दा
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द्वि
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पु
L
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G
ग
L
मि
G
ष्यन्
L
ए
G
ते
G
व
L
यं
G
स
G
र्व
L
स
L
मृ
G
द्ध
L
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G
मा
G
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G
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G
म
L
यं
G
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G
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L
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L
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L
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G
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G
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L
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G
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G
स्य
L
य
L
दे
G
ष
L
स
G
र्वं
G
प्र
L
प
G
त्स्य
L
ते
G
रा
G
ष्ट्र
L
मि
L
दं
G
चि
L
रा
G
य
L
Verse 2.14.26
<lg xml:id="R.2.14.26" n="2.14.26">
  <l>स घोषवद्भिश्च हयैः सनागैः पुरःसरैः स्वस्तिकसूतमागधैः ।</l>
  <l>महीयमानः प्रवरैश्च वादकैरभिष्टुतो वैश्रवणो यथा ययौ ॥ २६ ॥</l>
</lg>
स
L
घो
G
ष
L
व
G
द्भि
G
श्च
L
ह
L
यैः
G
स
L
ना
G
गैः
G
पु
L
रः
G
स
L
रैः
G
स्व
G
स्ति
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क
L
सू
G
त
L
मा
G
ग
L
धैः
G
म
L
ही
G
य
L
मा
G
नः
G
प्र
L
व
L
रै
G
श्च
L
वा
G
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L
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G
र
L
भि
G
ष्टु
L
तो
G
वै
G
श्र
L
व
L
णो
G
य
L
था
G
य
L
यौ
G
Verse 2.19.22
<lg xml:id="R.2.19.22" n="2.19.22">
  <l>न लक्ष्मणास्मिन्मम राज्यविघ्ने माता यवीयस्यतिशङ्कनीया ।</l>
  <l>दैवाभिपन्ना हि वदन्त्यनिष्टं जानासि दैवं च तथाप्रभावम् ॥ २२ ॥</l>
</lg>
न
L
ल
G
क्ष्म
L
णा
G
स्मि
G
न्म
L
म
L
रा
G
ज्य
L
वि
G
घ्ने
G
मा
G
ता
G
य
L
वी
G
य
G
स्य
L
ति
L
श
G
ङ्क
L
नी
G
या
G
दै
G
वा
G
भि
L
प
G
न्ना
G
हि
L
व
L
द
G
न्त्य
L
नि
G
ष्टं
G
जा
G
ना
G
सि
L
दै
G
वं
G
च
L
त
L
था
G
प्र
L
भा
G
वम्
L
Verse 2.28.20
<lg xml:id="R.2.28.20" n="2.28.20">
  <l>वसिष्ठपुत्रं तु सुयज्ञमार्यं त्वमानयाशु प्रवरं द्विजानाम् ।</l>
  <l>अभिप्रयास्यामि वनं समस्तानभ्यर्च्य शिष्टानपरान्द्विजातीन् ॥ २० ॥</l>
</lg>
व
L
सि
G
ष्ठ
L
पु
G
त्रं
G
तु
L
सु
L
य
G
ज्ञ
L
मा
G
र्यं
G
त्व
L
मा
G
न
L
या
G
शु
G
प्र
L
व
L
रं
G
द्वि
L
जा
G
नाम्
G
अ
L
भि
G
प्र
L
या
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स्या
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मि
L
व
L
नं
G
स
L
म
G
स्ता
G
न
G
भ्य
G
र्च्य
L
शि
G
ष्टा
G
न
L
प
L
रा
G
न्द्वि
L
जा
G
तीन्
G
Verse 2.30.22
<lg xml:id="R.2.30.22" n="2.30.22">
  <l>प्रतीक्षमाणोऽभिजनं तदार्तमनार्तरूपः प्रहसन्निवाथ ।</l>
  <l>जगाम रामः पितरं दिदृक्षुः पितुर्निदेशं विधिवच्चिकीर्षुः ॥ २२ ॥</l>
</lg>
प्र
L
ती
G
क्ष
L
मा
G
णो
G
भि
L
ज
L
नं
G
त
L
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G
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म
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G
र्त
L
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G
पः
G
प्र
L
ह
L
स
G
न्नि
L
वा
G
थ
L
ज
L
गा
G
म
L
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G
मः
G
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L
त
L
रं
G
दि
L
दृ
G
क्षुः
G
पि
L
तु
G
र्नि
L
दे
G
शं
G
वि
L
धि
L
व
G
च्चि
L
की
G
र्षुः
G
Verse 2.30.23
<lg xml:id="R.2.30.23" n="2.30.23">
  <l>तत्पूर्वमैक्ष्वाकसुतो महात्मा रामो गमिष्यन्वनमार्तरूपम् ।</l>
  <l>व्यतिष्ठत प्रेक्ष्य तदा सुमन्त्रं पितुर्महात्मा प्रतिहारणार्थम् ॥ २३ ॥</l>
</lg>
त
G
त्पू
G
र्व
L
मै
G
क्ष्वा
G
क
L
सु
L
तो
G
म
L
हा
G
त्मा
G
रा
G
मो
G
ग
L
मि
G
ष्य
G
न्व
L
न
L
मा
G
र्त
L
रू
G
पम्
L
व्य
L
ति
G
ष्ठ
L
त
G
प्रे
G
क्ष्य
L
त
L
दा
G
सु
L
म
G
न्त्रं
G
पि
L
तु
G
र्म
L
हा
G
त्मा
G
प्र
L
ति
L
हा
G
र
L
णा
G
र्थम्
L
Verse 2.32.22
<lg xml:id="R.2.32.22" n="2.32.22">
  <l>अनुव्रजिष्याम्यहमद्य रामं राज्यं परित्यज्य सुखं धनं च ।</l>
  <l>सहैव राज्ञा भरतेन च त्वं यथा सुखं भुङ्क्ष्व चिराय राज्यम् ॥ २२ ॥</l>
</lg>
अ
L
नु
G
व्र
L
जि
G
ष्या
G
म्य
L
ह
L
म
G
द्य
L
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G
मं
G
रा
G
ज्यं
G
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L
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त्य
G
ज्य
L
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L
नं
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च
L
स
L
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G
व
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L
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L
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न
L
च
G
त्वं
G
य
L
था
G
सु
L
खं
G
भु
G
ङ्क्ष्व
L
चि
L
रा
G
य
L
रा
G
ज्यम्
L
Verse 2.35.38
<lg xml:id="R.2.35.38" n="2.35.38">
  <l>तेषां वचः सर्वगुणोपपन्नं प्रस्विन्नगात्रः प्रविषण्णरूपः ।</l>
  <l>निशम्य राजा कृपणः सभार्यो व्यवस्थितस्तं सुतमीक्षमाणः ॥ ३८ ॥</l>
</lg>
ते
G
षां
G
व
L
चः
G
स
G
र्व
L
गु
L
णो
G
प
L
प
G
न्नं
G
प्र
G
स्वि
G
न्न
L
गा
G
त्रः
G
प्र
L
वि
L
ष
G
ण्ण
L
रू
G
पः
G
नि
L
श
G
म्य
L
रा
G
जा
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कृ
L
प
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स
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र्यो
G
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L
व
G
स्थि
L
त
G
स्तं
G
सु
L
त
L
मी
G
क्ष
L
मा
G
णः
G
Verse 2.37.28
<lg xml:id="R.2.37.28" n="2.37.28">
  <l>तं राममेवानुविचिन्तयन्तं समीक्ष्य देवी शयने नरेन्द्रम् ।</l>
  <l>उपोपविश्याधिकमार्तरूपा विनिःश्वसन्ती विललाप कृच्छ्रं ॥ २८ ॥</l>
</lg>
तं
G
रा
G
म
L
मे
G
वा
G
नु
L
वि
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चि
G
न्त
L
य
G
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L
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L
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L
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G
श्व
L
स
G
न्ती
G
वि
L
ल
L
ला
G
प
L
कृ
G
च्छ्रं
G
Verse 2.39.16
<lg xml:id="R.2.39.16" n="2.39.16">
  <l>निशम्य तल्लक्ष्मणमातृवाक्यं रामस्य मातुर्नरदेवपत्न्याः ।</l>
  <l>सद्यः शरीरे विननाश शोकः शरद्गतो मेघ इवाल्पतोयः ॥ १६ ॥</l>
</lg>
नि
L
श
G
म्य
L
त
G
ल्ल
G
क्ष्म
L
ण
L
मा
G
तृ
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म
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G
स
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श
L
र
G
द्ग
L
तो
G
मे
G
घ
L
इ
L
वा
G
ल्प
L
तो
G
यः
G
Verse 2.46.78
<lg xml:id="R.2.46.78" n="2.46.78">
  <l>गतं तु गङ्गापरपारमाशु रामं सुमन्त्रः प्रततं निरीक्ष्य ।</l>
  <l>अध्वप्रकर्षाद्विनिवृत्तदृष्टिर्मुमोच बाष्पं व्यथितस्तपस्वी ॥ ७८ ॥</l>
</lg>
ग
L
तं
G
तु
L
ग
G
ङ्गा
G
प
L
र
L
पा
G
र
L
मा
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शु
L
रा
G
मं
G
सु
L
म
G
न्त्रः
G
प्र
L
त
L
तं
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अ
G
ध्व
G
प्र
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G
र्षा
G
द्वि
L
नि
L
वृ
G
त्त
L
दृ
G
ष्टि
G
र्मु
L
मो
G
च
L
बा
G
ष्पं
G
व्य
L
थि
L
त
G
स्त
L
प
G
स्वी
G
Verse 2.46.79
<lg xml:id="R.2.46.79" n="2.46.79">
  <l>तौ तत्र हत्वा चतुरो महामृगान्वराहमृश्यं पृषतं महारुरुम् ।</l>
  <l>आदाय मेध्यं त्वरितं बुभुक्षितौ वासाय काले ययतुर्वनस्पतिम् ॥ ७९ ॥</l>
</lg>
तौ
G
त
G
त्र
L
ह
G
त्वा
G
च
L
तु
L
रो
G
म
L
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गा
G
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L
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L
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G
म
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हा
G
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L
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L
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G
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L
मे
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L
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L
तं
G
बु
L
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G
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सा
G
य
L
का
G
ले
G
य
L
य
L
तु
G
र्व
L
न
G
स्प
L
तिम्
L
Verse 2.57.39
<lg xml:id="R.2.57.39" n="2.57.39">
  <l>जलार्द्रगात्रं तु विलप्य कृच्छान्मर्मव्रणं संततमुच्छसन्तम् ।</l>
  <l>ततः सरय्वां तमहं शयानं समीक्ष्य भद्रे सुभृशं विषण्णः ॥ ३९ ॥</l>
</lg>
ज
L
ला
G
र्द्र
L
गा
G
त्रं
G
तु
L
वि
L
ल
G
प्य
L
कृ
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च्छा
G
न्म
G
र्म
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व्र
L
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सं
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त
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त
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मु
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च्छ
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स
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न्तम्
L
त
L
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क्ष्य
L
भ
G
द्रे
G
सु
L
भृ
L
शं
G
वि
L
ष
G
ण्णः
G
Verse 2.61.25
<lg xml:id="R.2.61.25" n="2.61.25">
  <l>स नः समीक्ष्य द्विजवर्यवृत्तं नृपं विना राज्यमरण्यभूतम् ।</l>
  <l>कुमारमिक्ष्वाकुसुतं वदान्यं त्वमेव राजानमिहाभिषिञ्चय ॥ २५ ॥</l>
</lg>
स
L
नः
G
स
L
मी
G
क्ष्य
G
द्वि
L
ज
L
व
G
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G
त्तं
G
नृ
L
पं
G
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G
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G
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G
ण्य
L
भू
G
तम्
L
कु
L
मा
G
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L
मि
G
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G
कु
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L
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व
L
रा
G
जा
G
न
L
मि
L
हा
G
भि
L
षि
G
ञ्च
L
य
L
Verse 2.62.15
<lg xml:id="R.2.62.15" n="2.62.15">
  <l>भर्तुः प्रियार्थं कुलरक्षणार्थं भर्तुश्च वंशस्य परिग्रहार्थम् ।</l>
  <l>अहेडमानास्त्वरया स्म दूता रात्र्यां तु ते तत्पुरमेव याताः ॥ १५ ॥</l>
</lg>
भ
G
र्तुः
G
प्रि
L
या
G
र्थं
G
कु
L
ल
L
र
G
क्ष
L
णा
G
र्थं
G
भ
G
र्तु
G
श्च
L
वं
G
श
G
स्य
L
प
L
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G
ग्र
L
हा
G
र्थम्
L
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L
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G
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G
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L
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L
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G
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L
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ता
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त्र्यां
G
तु
L
ते
G
त
G
त्पु
L
र
L
मे
G
व
L
या
G
ताः
G
Verse 2.64.24
<lg xml:id="R.2.64.24" n="2.64.24">
  <l>बलेन गुप्तो भरतो महात्मा सहार्यकस्यात्मसमैरमात्यैः ।</l>
  <l>आदाय शत्रुघ्नमपेतशत्रुर्गृहाद्ययौ सिद्ध इवेन्द्रलोकात् ॥ २४ ॥</l>
</lg>
ब
L
ले
G
न
L
गु
G
प्तो
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भ
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र
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द्य
L
यौ
G
सि
G
द्ध
L
इ
L
वे
G
न्द्र
L
लो
G
कात्
G
Verse 2.65.27
<lg xml:id="R.2.65.27" n="2.65.27">
  <l>तां शून्यशृङ्गाटकवेश्मरथ्यां रजोऽरुणद्वारकपाटयन्त्राम् ।</l>
  <l>दृष्ट्वा पुरीमिन्द्रपुरी प्रकाशां दुःखेन संपूर्णतरो बभूव ॥ २७ ॥</l>
</lg>
तां
G
शू
G
न्य
L
शृ
G
ङ्गा
G
ट
L
क
L
वे
G
श्म
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र
G
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G
र
L
जो
G
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ण
G
द्वा
G
र
L
क
L
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G
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L
य
G
न्त्राम्
G
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G
ष्ट्वा
G
पु
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री
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न्द्र
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पु
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री
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शां
G
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खे
G
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L
सं
G
पू
G
र्ण
L
त
L
रो
G
ब
L
भू
G
व
L
Verse 2.65.28
<lg xml:id="R.2.65.28" n="2.65.28">
  <l>बहूनि पश्यन्मनसोऽप्रियाणि यान्यन्न्यदा नास्य पुरे बभूवुः ।</l>
  <l>अवाक्शिरा दीनमना नहृष्टः पितुर्महात्मा प्रविवेश वेश्म ॥ २८ ॥</l>
</lg>
ब
L
हू
G
नि
L
प
G
श्य
G
न्म
L
न
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प्रि
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न
L
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G
ष्टः
G
पि
L
तु
G
र्म
L
हा
G
त्मा
G
प्र
L
वि
L
वे
G
श
L
वे
G
श्म
L
Verse 2.66.45
<lg xml:id="R.2.66.45" n="2.66.45">
  <l>तत्पुत्र शीघ्रं विधिना विधिज्ञैर्वसिष्ठमुख्यैः सहितो द्विजेन्द्रैः ।</l>
  <l>संकाल्य राजानमदीनसत्त्वमात्मानमुर्व्यामभिषेचयस्व ॥ ४५ ॥</l>
</lg>
त
G
त्पु
G
त्र
L
शी
G
घ्रं
G
वि
L
धि
L
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G
वि
L
धि
G
ज्ञै
G
र्व
L
सि
G
ष्ठ
L
मु
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ख्यैः
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द्वि
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न्द्रैः
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त्त्व
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त्मा
G
न
L
मु
G
र्व्या
G
म
L
भि
L
षे
G
च
L
य
G
स्व
L
Verse 2.67.15
<lg xml:id="R.2.67.15" n="2.67.15">
  <l>इत्येवमुक्त्वा भरतो महात्मा प्रियेतरैर्वाक्यगणैस्तुदंस्ताम् ।</l>
  <l>शोकातुरश्चापि ननाद भूयः सिंहो यथा पर्वतगह्वरस्थः ॥ १५ ॥</l>
</lg>
इ
G
त्ये
G
व
L
मु
G
क्त्वा
G
भ
L
र
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तो
G
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हा
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त्मा
G
प्रि
L
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G
त
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G
र्वा
G
क्य
L
ग
L
णै
G
स्तु
L
दं
G
स्ताम्
G
शो
G
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G
तु
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G
श्चा
G
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द
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यः
G
सिं
G
हो
G
य
L
था
G
प
G
र्व
L
त
L
ग
G
ह्व
L
र
G
स्थः
G
Verse 2.68.29
<lg xml:id="R.2.68.29" n="2.68.29">
  <l>संरक्तनेत्रः शिथिलाम्बरस्तदा विधूतसर्वाभरणः परंतपः ।</l>
  <l>बभूव भूमौ पतितो नृपात्मजः शचीपतेः केतुरिवोत्सवक्षये ॥ २९ ॥</l>
</lg>
सं
G
र
G
क्त
L
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G
त्रः
G
शि
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ला
G
म्ब
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र
G
स्त
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दा
G
वि
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धू
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त
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L
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णः
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G
ब
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मौ
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G
त्म
L
जः
G
श
L
ची
G
प
L
तेः
G
के
G
तु
L
रि
L
वो
G
त्स
L
व
G
क्ष
L
ये
G
Verse 2.69.34
<lg xml:id="R.2.69.34" n="2.69.34">
  <l>लालप्यमानस्य विचेतनस्य प्रनष्टबुद्धेः पतितस्य भूमौ ।</l>
  <l>मुहुर्मुहुर्निःश्वसतश्च दीर्घं सा तस्य शोकेन जगाम रात्रिः ॥ ३४ ॥</l>
</lg>
ला
G
ल
G
प्य
L
मा
G
न
G
स्य
L
वि
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चे
G
त
L
न
G
स्य
G
प्र
L
न
G
ष्ट
L
बु
G
द्धेः
G
प
L
ति
L
त
G
स्य
L
भू
G
मौ
G
मु
L
हु
G
र्मु
L
हु
G
र्निः
G
श्व
L
स
L
त
G
श्च
L
दी
G
र्घं
G
सा
G
त
G
स्य
L
शो
G
के
G
न
L
ज
L
गा
G
म
L
रा
G
त्रिः
G
Verse 2.70.23
<lg xml:id="R.2.70.23" n="2.70.23">
  <l>कृतोदकं ते भरतेन सार्धं नृपाङ्गना मन्त्रिपुरोहिताश्च ।</l>
  <l>पुरं प्रविश्याश्रुपरीतनेत्रा भूमौ दशाहं व्यनयन्त दुःखम् ॥ २३ ॥</l>
</lg>
कृ
L
तो
G
द
L
कं
G
ते
G
भ
L
र
L
ते
G
न
L
सा
G
र्धं
G
नृ
L
पा
G
ङ्ग
L
ना
G
म
G
न्त्रि
L
पु
L
रो
G
हि
L
ता
G
श्च
L
पु
L
रं
G
प्र
L
वि
G
श्या
G
श्रु
L
प
L
री
G
त
L
ने
G
त्रा
G
भू
G
मौ
G
द
L
शा
G
हं
G
व्य
L
न
L
य
G
न्त
L
दुः
G
खम्
L
Verse 2.72.25
<lg xml:id="R.2.72.25" n="2.72.25">
  <l>शत्रुघ्नविक्षेपविमूढसंज्ञां समीक्ष्य कुब्जां भरतस्य माता ।</l>
  <l>शनैः समाश्वासयदार्तरूपां क्रौञ्चीं विलग्नामिव वीक्षमाणाम् ॥ २५ ॥</l>
</lg>
श
G
त्रु
G
घ्न
L
वि
G
क्षे
G
प
L
वि
L
मू
G
ढ
L
सं
G
ज्ञां
G
स
L
मी
G
क्ष्य
L
कु
G
ब्जां
G
भ
L
र
L
त
G
स्य
L
मा
G
ता
G
श
L
नैः
G
स
L
मा
G
श्वा
G
स
L
य
L
दा
G
र्त
L
रू
G
पां
G
क्रौ
G
ञ्चीं
G
वि
L
ल
G
ग्ना
G
मि
L
व
L
वी
G
क्ष
L
मा
G
णाम्
G
Verse 2.76.28
<lg xml:id="R.2.76.28" n="2.76.28">
  <l>तूर्णं समुत्थाय सुमन्त्र गच्छ बलस्य योगाय बलप्रधानान् ।</l>
  <l>आनेतुमिच्छामि हि तं वनस्थं प्रसाद्य रामं जगतो हिताय ॥ २८ ॥</l>
</lg>
तू
G
र्णं
G
स
L
मु
G
त्था
G
य
L
सु
L
म
G
न्त्र
L
ग
G
च्छ
L
ब
L
ल
G
स्य
L
यो
G
गा
G
य
L
ब
L
ल
G
प्र
L
धा
G
नान्
G
आ
G
ने
G
तु
L
मि
G
च्छा
G
मि
L
हि
L
तं
G
व
L
न
G
स्थं
G
प्र
L
सा
G
द्य
L
रा
G
मं
G
ज
L
ग
L
तो
G
हि
L
ता
G
य
L
Verse 2.76.29
<lg xml:id="R.2.76.29" n="2.76.29">
  <l>स सूतपुत्रो भरतेन सम्यगाज्ञापितः संपरिपूर्णकामः ।</l>
  <l>शशास सर्वान्प्रकृतिप्रधानान्बलस्य मुख्यांश्च सुहृज्जनं च ॥ २९ ॥</l>
</lg>
स
L
सू
G
त
L
पु
G
त्रो
G
भ
L
र
L
ते
G
न
L
स
G
म्य
L
गा
G
ज्ञा
G
पि
L
तः
G
सं
G
प
L
रि
L
पू
G
र्ण
L
का
G
मः
G
श
L
शा
G
स
L
स
G
र्वा
G
न्प्र
L
कृ
L
ति
G
प्र
L
धा
G
ना
G
न्ब
L
ल
G
स्य
L
मु
G
ख्यां
G
श्च
L
सु
L
हृ
G
ज्ज
L
नं
G
च
L
Verse 2.76.30
<lg xml:id="R.2.76.30" n="2.76.30">
  <l>ततः समुत्थाय कुले कुले ते राजन्यवैश्या वृषलाश्च विप्राः ।</l>
  <l>अयूयुजन्नुष्ट्ररथान्खरांश्च नागान्हयांश्चैव कुलप्रसूतान् ॥ ३० ॥</l>
</lg>
त
L
तः
G
स
L
मु
G
त्था
G
य
L
कु
L
ले
G
कु
L
ले
G
ते
G
रा
G
ज
G
न्य
L
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G
श्या
G
वृ
L
ष
L
ला
G
श्च
L
वि
G
प्राः
G
अ
L
यू
G
यु
L
ज
G
न्नु
G
ष्ट्र
L
र
L
था
G
न्ख
L
रां
G
श्च
L
ना
G
गा
G
न्ह
L
यां
G
श्चै
G
व
L
कु
L
ल
G
प्र
L
सू
G
तान्
G
Verse 2.83.22
<lg xml:id="R.2.83.22" n="2.83.22">
  <l>आश्वासयित्वा च चमूं महात्मा निवेशयित्वा च यथोपजोषम् ।</l>
  <l>द्रष्टुं भरद्वाजमृषिप्रवर्यमृत्विग्वृतः सन्भरतः प्रतस्थे ॥ २२ ॥</l>
</lg>
आ
G
श्वा
G
स
L
यि
G
त्वा
G
च
L
च
L
मूं
G
म
L
हा
G
त्मा
G
नि
L
वे
G
श
L
यि
G
त्वा
G
च
L
य
L
थो
G
प
L
जो
G
षम्
L
द्र
G
ष्टुं
G
भ
L
र
G
द्वा
G
ज
L
मृ
L
षि
G
प्र
L
व
G
र्य
L
मृ
G
त्वि
G
ग्वृ
L
तः
G
स
G
न्भ
L
र
L
तः
G
प्र
L
त
G
स्थे
G
Verse 2.86.36
<lg xml:id="R.2.86.36" n="2.86.36">
  <l>सा संप्रहृष्टद्विपवाजियोधा वित्रासयन्ती मृगपक्षिसंघान् ।</l>
  <l>महद्वनं तत्प्रविगाहमाना रराज सेना भरतस्य तत्र ॥ ३६ ॥</l>
</lg>
सा
G
सं
G
प्र
L
हृ
G
ष्ट
G
द्वि
L
प
L
वा
G
जि
L
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G
धा
G
वि
G
त्रा
G
स
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य
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न्ती
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मृ
L
ग
L
प
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क्षि
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घान्
G
म
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ह
G
द्व
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त
G
त्प्र
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गा
G
ह
L
मा
G
ना
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र
L
रा
G
ज
L
से
G
ना
G
भ
L
र
L
त
G
स्य
L
त
G
त्र
L
Verse 2.91.17
<lg xml:id="R.2.91.17" n="2.91.17">
  <l>सा चित्रकूटे भरतेन सेना धर्मं पुरस्कृत्य विधूय दर्पम् ।</l>
  <l>प्रसादनार्थं रघुनन्दनस्य विरोचते नीतिमता प्रणीता ॥ १७ ॥</l>
</lg>
सा
G
चि
G
त्र
L
कू
G
टे
G
भ
L
र
L
ते
G
न
L
से
G
ना
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र्मं
G
पु
L
र
G
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त्य
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वि
L
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G
य
L
द
G
र्पम्
L
प्र
L
सा
G
द
L
ना
G
र्थं
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न
G
न्द
L
न
G
स्य
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रो
G
च
L
ते
G
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G
ति
L
म
L
ता
G
प्र
L
णी
G
ता
G
Verse 2.92.15
<lg xml:id="R.2.92.15" n="2.92.15">
  <l>स चित्रकूटे तु गिरौ निशाम्य रामाश्रमं पुण्यजनोपपन्नम् ।</l>
  <l>गुहेन सार्धं त्वरितो जगाम पुनर्निवेश्यैव चमूं महात्मा ॥ १५ ॥</l>
</lg>
स
L
चि
G
त्र
L
कू
G
टे
G
तु
L
गि
L
रौ
G
नि
L
शा
G
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G
मा
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श्र
L
मं
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पु
G
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L
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L
प
G
न्नम्
L
गु
L
हे
G
न
L
सा
G
र्धं
G
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L
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तो
G
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G
म
L
पु
L
न
G
र्नि
L
वे
G
श्यै
G
व
L
च
L
मूं
G
म
L
हा
G
त्मा
G
Verse 2.93.40
<lg xml:id="R.2.93.40" n="2.93.40">
  <l>ततः सुमन्त्रेण गुहेन चैव समीयतू राजसुतावरण्ये ।</l>
  <l>दिवाकरश्चैव निशाकरश्च यथाम्बरे शुक्रबृहस्पतिभ्याम् ॥ ४० ॥</l>
</lg>
त
L
तः
G
सु
L
म
G
न्त्रे
G
ण
L
गु
L
हे
G
न
L
चै
G
व
L
स
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मी
G
य
L
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G
रा
G
ज
L
सु
L
ता
G
व
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र
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G
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L
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G
क
L
र
G
श्चै
G
व
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नि
L
शा
G
क
L
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G
श्च
L
य
L
था
G
म्ब
L
रे
G
शु
G
क्र
L
बृ
L
ह
G
स्प
L
ति
G
भ्याम्
G
Verse 2.93.41
<lg xml:id="R.2.93.41" n="2.93.41">
  <l>तान्पार्थिवान्वारणयूथपाभान्समागतांस्तत्र महत्यरण्ये ।</l>
  <l>वनौकसस्तेऽपि समीक्ष्य सर्वेऽप्यश्रूण्यमुञ्चन्प्रविहाय हर्षम् ॥ ४१ ॥</l>
</lg>
ता
G
न्पा
G
र्थि
L
वा
G
न्वा
G
र
L
ण
L
यू
G
थ
L
पा
G
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G
न्स
L
मा
G
ग
L
तां
G
स्त
G
त्र
L
म
L
ह
G
त्य
L
र
G
ण्ये
G
व
L
नौ
G
क
L
स
G
स्ते
G
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L
स
L
मी
G
क्ष्य
L
स
G
र्वे
G
प्य
G
श्रू
G
ण्य
L
मु
G
ञ्च
G
न्प्र
L
वि
L
हा
G
य
L
ह
G
र्षम्
L
Verse 2.95.31
<lg xml:id="R.2.95.31" n="2.95.31">
  <l>इदं भुङ्क्ष्व महाराजप्रीतो यदशना वयम् ।</l>
  <l>यदन्नः पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः ॥ ३१ ॥</l>
</lg>
इ
L
दं
G
भु
G
ङ्क्ष्व
L
म
L
हा
G
रा
G
ज
G
प्री
G
तो
G
य
L
द
L
श
L
ना
G
व
L
यम्
L
य
L
द
G
न्नः
G
पु
L
रु
L
षो
G
भ
L
व
L
ति
L
त
L
द
G
न्ना
G
स्त
G
स्य
L
दे
G
व
L
ताः
G
Verse 2.101.30
<lg xml:id="R.2.101.30" n="2.101.30">
  <l>सत्यं च धर्मं च पराक्रमं च भूतानुकम्पां प्रियवादितां च ।</l>
  <l>द्विजातिदेवातिथिपूजनं च पन्थानमाहुस्त्रिदिवस्य सन्तः ॥ ३० ॥</l>
</lg>
स
G
त्यं
G
च
L
ध
G
र्मं
G
च
L
प
L
रा
G
क्र
L
मं
G
च
L
भू
G
ता
G
नु
L
क
G
म्पां
G
प्रि
L
य
L
वा
G
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L
तां
G
च
L
द्वि
L
जा
G
ति
L
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G
वा
G
ति
L
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L
पू
G
ज
L
नं
G
च
L
प
G
न्था
G
न
L
मा
G
हु
G
स्त्रि
L
दि
L
व
G
स्य
L
स
G
न्तः
G
Verse 2.101.31
<lg xml:id="R.2.101.31" n="2.101.31">
  <l>धर्मे रताः सत्पुरुषैः समेतास्तेजस्विनो दानगुणप्रधानाः ।</l>
  <l>अहिंसका वीतमलाश्च लोके भवन्ति पूज्या मुनयः प्रधानाः ॥ ३१ ॥</l>
</lg>
ध
G
र्मे
G
र
L
ताः
G
स
G
त्पु
L
रु
L
षैः
G
स
L
मे
G
ता
G
स्ते
G
ज
G
स्वि
L
नो
G
दा
G
न
L
गु
L
ण
G
प्र
L
धा
G
नाः
G
अ
L
हिं
G
स
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G
वी
G
त
L
म
L
ला
G
श्च
L
लो
G
के
G
भ
L
व
G
न्ति
L
पू
G
ज्या
G
मु
L
न
L
यः
G
प्र
L
धा
G
नाः
G
Verse 2.104.25
<lg xml:id="R.2.104.25" n="2.104.25">
  <l>तं मातरो बाष्पगृहीतकण्ठो दुःखेन नामन्त्रयितुं हि शेकुः ।</l>
  <l>स त्वेव मातॄरभिवाद्य सर्वा रुदन्कुटीं स्वां प्रविवेश रामः ॥ २५ ॥</l>
</lg>
तं
G
मा
G
त
L
रो
G
बा
G
ष्प
L
गृ
L
ही
G
त
L
क
G
ण्ठो
G
दुः
G
खे
G
न
L
ना
G
म
G
न्त्र
L
यि
L
तुं
G
हि
L
शे
G
कुः
G
स
G
त्वे
G
व
L
मा
G
तॄ
G
र
L
भि
L
वा
G
द्य
L
स
G
र्वा
G
रु
L
द
G
न्कु
L
टीं
G
स्वां
G
प्र
L
वि
L
वे
G
श
L
रा
G
मः
G
Verse 2.108.25
<lg xml:id="R.2.108.25" n="2.108.25">
  <l>रामः संसाध्य त्वृषिगणमनुगमनाद्देशात्तस्माच्चित्कुलपतिमभिवाद्यर्षिम् ।</l>
  <l>सम्यक्प्रीतैस्तैरनुमत उपदिष्टार्थः पुण्यं वासाय स्वनिलयमुपसंपेदे ॥ २५ ॥</l>
</lg>
रा
G
मः
G
सं
G
सा
G
ध्य
G
त्वृ
L
षि
L
ग
L
ण
L
म
L
नु
L
ग
L
म
L
ना
G
द्दे
G
शा
G
त्त
G
स्मा
G
च्चि
G
त्कु
L
ल
L
प
L
ति
L
म
L
भि
L
वा
G
द्य
G
र्षिम्
L
स
G
म्य
G
क्प्री
G
तै
G
स्तै
G
र
L
नु
L
म
L
त
L
उ
L
प
L
दि
G
ष्टा
G
र्थः
G
पु
G
ण्यं
G
वा
G
सा
G
य
G
स्व
L
नि
L
ल
L
य
L
मु
L
प
L
सं
G
पे
G
दे
G
Verse 3.5.21
<lg xml:id="R.3.5.21" n="3.5.21">
  <l>दत्त्वा वरं चापि तपोधनानां धर्मे धृतात्मा सहलक्ष्मणेन ।</l>
  <l>तपोधनैश्चापि सहार्य वृत्तः सुतीष्क्णमेवाभिजगाम वीरः ॥ २१ ॥</l>
</lg>
द
G
त्त्वा
G
व
L
रं
G
चा
G
पि
L
त
L
पो
G
ध
L
ना
G
नां
G
ध
G
र्मे
G
धृ
L
ता
G
त्मा
G
स
L
ह
L
ल
G
क्ष्म
L
णे
G
न
L
त
L
पो
G
ध
L
नै
G
श्चा
G
पि
L
स
L
हा
G
र्य
L
वृ
G
त्तः
G
सु
L
ती
G
ष्क्ण
L
मे
G
वा
G
भि
L
ज
L
गा
G
म
L
वी
G
रः
G
Verse 3.6.22
<lg xml:id="R.3.6.22" n="3.6.22">
  <l>ततः शुभं तापसभोज्यमन्नं स्वयं सुतीक्ष्णः पुरुषर्षभाभ्याम् ।</l>
  <l>ताभ्यां सुसत्कृत्य ददौ महात्मा संध्यानिवृत्तौ रजनीं समीक्ष्य ॥ २२ ॥</l>
</lg>
त
L
तः
G
शु
L
भं
G
ता
G
प
L
स
L
भो
G
ज्य
L
म
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न्नं
G
स्व
L
यं
G
सु
L
ती
G
क्ष्णः
G
पु
L
रु
L
ष
G
र्ष
L
भा
G
भ्याम्
G
ता
G
भ्यां
G
सु
L
स
G
त्कृ
G
त्य
L
द
L
दौ
G
म
L
हा
G
त्मा
G
सं
G
ध्या
G
नि
L
वृ
G
त्तौ
G
र
L
ज
L
नीं
G
स
L
मी
G
क्ष्य
L
Verse 3.8.29
<lg xml:id="R.3.8.29" n="3.8.29">
  <l>स्त्रीचापलादेतदुदाहृतं मे धर्मं च वक्तुं तव कः समर्थः ।</l>
  <l>विचार्य बुद्ध्या तु सहानुजेन यद्रोचते तत्कुरु माचिरेण ॥ २९ ॥</l>
</lg>
स्त्री
G
चा
G
प
L
ला
G
दे
G
त
L
दु
L
दा
G
हृ
L
तं
G
मे
G
ध
G
र्मं
G
च
L
व
G
क्तुं
G
त
L
व
L
कः
G
स
L
म
G
र्थः
G
वि
L
चा
G
र्य
L
बु
G
द्ध्या
G
तु
L
स
L
हा
G
नु
L
जे
G
न
L
य
G
द्रो
G
च
L
ते
G
त
G
त्कु
L
रु
L
मा
G
चि
L
रे
G
ण
L
Verse 3.9.21
<lg xml:id="R.3.9.21" n="3.9.21">
  <l>इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा सीतां प्रियां मैथिल राजपुत्रीम् ।</l>
  <l>रामो धनुष्मान्सहलक्ष्मणेन जगाम रम्याणि तपोवनानि ॥ २१ ॥</l>
</lg>
इ
G
त्ये
G
व
L
मु
G
क्त्वा
G
व
L
च
L
नं
G
म
L
हा
G
त्मा
G
सी
G
तां
G
प्रि
L
यां
G
मै
G
थि
L
ल
L
रा
G
ज
L
पु
G
त्रीम्
G
रा
G
मो
G
ध
L
नु
G
ष्मा
G
न्स
L
ह
L
ल
G
क्ष्म
L
णे
G
न
L
ज
L
गा
G
म
L
र
G
म्या
G
णि
L
त
L
पो
G
व
L
ना
G
नि
L
Verse 3.10.70
<lg xml:id="R.3.10.70" n="3.10.70">
  <l>अभिवादये त्वा भगवन्सुखमध्युषितो निशाम् ।</l>
  <l>आमन्त्रये त्वां गच्छामि गुरुं ते द्रष्टुमग्रजम् ॥ ७० ॥</l>
</lg>
अ
L
भि
L
वा
G
द
L
ये
G
त्वा
G
भ
L
ग
L
व
G
न्सु
L
ख
L
म
G
ध्यु
L
षि
L
तो
G
नि
L
शाम्
G
आ
G
म
G
न्त्र
L
ये
G
त्वां
G
ग
G
च्छा
G
मि
L
गु
L
रुं
G
ते
G
द्र
G
ष्टु
L
म
G
ग्र
L
जम्
L
Verse 3.22.34
<lg xml:id="R.3.22.34" n="3.22.34">
  <l>सा भीमवेगा समराभिकामा सुदारुणा राक्षसवीर सेना ।</l>
  <l>तौ राजपुत्रौ सहसाभ्युपेता मालाग्रहाणामिव चन्द्रसूर्यौ ॥ ३४ ॥</l>
</lg>
सा
G
भी
G
म
L
वे
G
गा
G
स
L
म
L
रा
G
भि
L
का
G
मा
G
सु
L
दा
G
रु
L
णा
G
रा
G
क्ष
L
स
L
वी
G
र
L
से
G
ना
G
तौ
G
रा
G
ज
L
पु
G
त्रौ
G
स
L
ह
L
सा
G
भ्यु
L
पे
G
ता
G
मा
G
ला
G
ग्र
L
हा
G
णा
G
मि
L
व
L
च
G
न्द्र
L
सू
G
र्यौ
G
Verse 3.27.28
<lg xml:id="R.3.27.28" n="3.27.28">
  <l>त्रिभिस्त्रिवेणुं बलवान्द्वाभ्यामक्षं महाबलः ।</l>
  <l>द्वादशेन तु बाणेन खरस्य सशरं धनुः ।</l>
  <l>छित्त्वा वज्रनिकाशेन राघवः प्रहसन्निव ।</l>
  <l>त्रयोदशेनेन्द्रसमो बिभेद समरे खरम् ॥ २८ ॥</l>
</lg>
त्रि
L
भि
G
स्त्रि
L
वे
G
णुं
G
ब
L
ल
L
वा
G
न्द्वा
G
भ्या
G
म
G
क्षं
G
म
L
हा
G
ब
L
लः
G
द्वा
G
द
L
शे
G
न
L
तु
L
बा
G
णे
G
न
L
ख
L
र
G
स्य
L
स
L
श
L
रं
G
ध
L
नुः
G
छि
G
त्त्वा
G
व
G
ज्र
L
नि
L
का
G
शे
G
न
L
रा
G
घ
L
वः
G
प्र
L
ह
L
स
G
न्नि
L
व
L
त्र
L
यो
G
द
L
शे
G
ने
G
न्द्र
L
स
L
मो
G
बि
L
भे
G
द
L
स
L
म
L
रे
G
ख
L
रम्
L
Verse 3.27.30
<lg xml:id="R.3.27.30" n="3.27.30">
  <l>तत्कर्म रामस्य महारथस्य समेत्य देवाश्च महर्षयश्च ।</l>
  <l>अपूजयन्प्राञ्जलयः प्रहृष्टास्तदा विमानाग्रगताः समेताः ॥ ३० ॥</l>
</lg>
त
G
त्क
G
र्म
L
रा
G
म
G
स्य
L
म
L
हा
G
र
L
थ
G
स्य
L
स
L
मे
G
त्य
L
दे
G
वा
G
श्च
L
म
L
ह
G
र्ष
L
य
G
श्च
L
अ
L
पू
G
ज
L
य
G
न्प्रा
G
ञ्ज
L
ल
L
यः
G
प्र
L
हृ
G
ष्टा
G
स्त
L
दा
G
वि
L
मा
G
ना
G
ग्र
L
ग
L
ताः
G
स
L
मे
G
ताः
G
Verse 3.38.21
<lg xml:id="R.3.38.21" n="3.38.21">
  <l>आसाद्य तं जीवितसंशयस्ते मृत्युर्ध्रुवो ह्यद्य मया विरुध्य ।</l>
  <l>एतद्यथावत्परिगृह्य बुद्ध्या यदत्र पथ्यं कुरु तत्तथा त्वम् ॥ २१ ॥</l>
</lg>
आ
G
सा
G
द्य
L
तं
G
जी
G
वि
L
त
L
सं
G
श
L
य
G
स्ते
G
मृ
G
त्यु
G
र्ध्रु
L
वो
G
ह्य
G
द्य
L
म
L
या
G
वि
L
रु
G
ध्य
L
ए
G
त
G
द्य
L
था
G
व
G
त्प
L
रि
L
गृ
G
ह्य
L
बु
G
द्ध्या
G
य
L
द
G
त्र
L
प
G
थ्यं
G
कु
L
रु
L
त
G
त्त
L
था
G
त्वम्
L
Verse 3.43.37
<lg xml:id="R.3.43.37" n="3.43.37">
  <l>ततस्तु सीतामभिवाद्य लक्ष्मणः कृताञ्जलिः किंचिदभिप्रणम्य ।</l>
  <l>अवेक्षमाणो बहुशश्च मैथिलीं जगाम रामस्य समीपमात्मवान् ॥ ३७ ॥</l>
</lg>
त
L
त
G
स्तु
L
सी
G
ता
G
म
L
भि
L
वा
G
द्य
L
ल
G
क्ष्म
L
णः
G
कृ
L
ता
G
ञ्ज
L
लिः
G
किं
G
चि
L
द
L
भि
G
प्र
L
ण
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म्य
L
अ
L
वे
G
क्ष
L
मा
G
णो
G
ब
L
हु
L
श
G
श्च
L
मै
G
थि
L
लीं
G
ज
L
गा
G
म
L
रा
G
म
G
स्य
L
स
L
मी
G
प
L
मा
G
त्म
L
वान्
G
Verse 3.45.41
<lg xml:id="R.3.45.41" n="3.45.41">
  <l>यदन्तरं काञ्चनसीसलोहयोर्यदन्तरं चन्दनवारिपङ्कयोः ।</l>
  <l>यदन्तरं हस्तिबिडालयोर्वने तदन्तरं दशरथेस्तवैव च ॥ ४१ ॥</l>
</lg>
य
L
द
G
न्त
L
रं
G
का
G
ञ्च
L
न
L
सी
G
स
L
लो
G
ह
L
यो
G
र्य
L
द
G
न्त
L
रं
G
च
G
न्द
L
न
L
वा
G
रि
L
प
G
ङ्क
L
योः
G
य
L
द
G
न्त
L
रं
G
ह
G
स्ति
L
बि
L
डा
G
ल
L
यो
G
र्व
L
ने
G
त
L
द
G
न्त
L
रं
G
द
L
श
L
र
L
थे
G
स्त
L
वै
G
व
L
च
L
Verse 3.45.43
<lg xml:id="R.3.45.43" n="3.45.43">
  <l>तस्मिन्सहस्राक्षसमप्रभावे रामे स्थिते कार्मुकबाणपाणौ ।</l>
  <l>हृतापि तेऽहं न जरां गमिष्ये वज्रं यथा मक्षिकयावगीर्णम् ॥ ४३ ॥</l>
</lg>
त
G
स्मि
G
न्स
L
ह
G
स्रा
G
क्ष
L
स
L
म
G
प्र
L
भा
G
वे
G
रा
G
मे
G
स्थि
L
ते
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का
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र्मु
L
क
L
बा
G
ण
L
पा
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णौ
G
हृ
L
ता
G
पि
L
ते
G
हं
G
न
L
ज
L
रां
G
ग
L
मि
G
ष्ये
G
व
G
ज्रं
G
य
L
था
G
म
G
क्षि
L
क
L
या
G
व
L
गी
G
र्णम्
L
Verse 3.45.44
<lg xml:id="R.3.45.44" n="3.45.44">
  <l>इतीव तद्वाक्यमदुष्टभावा सुदृष्टमुक्त्वा रजनीचरं तम् ।</l>
  <l>गात्रप्रकम्पाद्व्यथिता बभूव वातोद्धता सा कदलीव तन्वी ॥ ४४ ॥</l>
</lg>
इ
L
ती
G
व
L
त
G
द्वा
G
क्य
L
म
L
दु
G
ष्ट
L
भा
G
वा
G
सु
L
दृ
G
ष्ट
L
मु
G
क्त्वा
G
र
L
ज
L
नी
G
च
L
रं
G
तम्
L
गा
G
त्र
G
प्र
L
क
G
म्पा
G
द्व्य
L
थि
L
ता
G
ब
L
भू
G
व
L
वा
G
तो
G
द्ध
L
ता
G
सा
G
क
L
द
L
ली
G
व
L
त
G
न्वी
G
Verse 3.45.45
<lg xml:id="R.3.45.45" n="3.45.45">
  <l>तां वेपमानामुपलक्ष्य सीतां स रावणो मृत्युसमप्रभावः ।</l>
  <l>कुलं बलं नाम च कर्म चात्मनः समाचचक्षे भयकारणार्थम् ॥ ४५ ॥</l>
</lg>
तां
G
वे
G
प
L
मा
G
ना
G
मु
L
प
L
ल
G
क्ष्य
L
सी
G
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G
स
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रा
G
व
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मृ
G
त्यु
L
स
L
म
G
प्र
L
भा
G
वः
G
कु
L
लं
G
ब
L
लं
G
ना
G
म
L
च
L
क
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र्म
L
चा
G
त्म
L
नः
G
स
L
मा
G
च
L
च
G
क्षे
G
भ
L
य
L
का
G
र
L
णा
G
र्थम्
L
Verse 3.46.23
<lg xml:id="R.3.46.23" n="3.46.23">
  <l>जीवेच्चिरं वज्रधरस्य हस्ताच्छचीं प्रधृष्याप्रतिरूपरूपाम् ।</l>
  <l>न मादृशीं राक्षसधर्षयित्वा पीतामृतस्यापि तवास्ति मोक्षः ॥ २३ ॥</l>
</lg>
जी
G
वे
G
च्चि
L
रं
G
व
G
ज्र
L
ध
L
र
G
स्य
L
ह
G
स्ता
G
च्छ
L
चीं
G
प्र
L
धृ
G
ष्या
G
प्र
L
ति
L
रू
G
प
L
रू
G
पाम्
G
न
L
मा
G
दृ
L
शीं
G
रा
G
क्ष
L
स
L
ध
G
र्ष
L
यि
G
त्वा
G
पी
G
ता
G
मृ
L
त
G
स्या
G
पि
L
त
L
वा
G
स्ति
L
मो
G
क्षः
G
Verse 3.49.39
<lg xml:id="R.3.49.39" n="3.49.39">
  <l>तं नीलजीमूतनिकाशकल्पं सुपाण्डुरोरस्कमुदारवीर्यम् ।</l>
  <l>ददर्श लङ्काधिपतिः पृथिव्यां जटायुषं शान्तमिवाग्निदावम् ॥ ३९ ॥</l>
</lg>
तं
G
नी
G
ल
L
जी
G
मू
G
त
L
नि
L
का
G
श
L
क
G
ल्पं
G
सु
L
पा
G
ण्डु
L
रो
G
र
G
स्क
L
मु
L
दा
G
र
L
वी
G
र्यम्
L
द
L
द
G
र्श
L
ल
G
ङ्का
G
धि
L
प
L
तिः
G
पृ
L
थि
G
व्यां
G
ज
L
टा
G
यु
L
षं
G
शा
G
न्त
L
मि
L
वा
G
ग्नि
L
दा
G
वम्
L
Verse 3.51.25
<lg xml:id="R.3.51.25" n="3.51.25">
  <l>तथा भृशार्तां बहु चैव भाषिणीं विललाप पूर्वं करुणं च भामिनीम् ।</l>
  <l>जहार पापस्तरुणीं विवेष्टतीं नृपात्मजामागतगात्रवेपथुम् ॥ २५ ॥</l>
</lg>
त
L
था
G
भृ
L
शा
G
र्तां
G
ब
L
हु
L
चै
G
व
L
भा
G
षि
L
णीं
G
वि
L
ल
L
ला
G
प
L
पू
G
र्वं
G
क
L
रु
L
णं
G
च
L
भा
G
मि
L
नीम्
G
ज
L
हा
G
र
L
पा
G
प
G
स्त
L
रु
L
णीं
G
वि
L
वे
G
ष्ट
L
तीं
G
नृ
L
पा
G
त्म
L
जा
G
मा
G
ग
L
त
L
गा
G
त्र
L
वे
G
प
L
थुम्
L
Verse 3.55.19
<lg xml:id="R.3.55.19" n="3.55.19">
  <l>इदं हि रक्षोमृगसंनिकाशं प्रलोभ्य मां दूरमनुप्रयातम् ।</l>
  <l>हतं कथंचिन्महता श्रमेण स राक्षसोऽभून्म्रियमाण एव ॥ १९ ॥</l>
</lg>
इ
L
दं
G
हि
L
र
G
क्षो
G
मृ
L
ग
L
सं
G
नि
L
का
G
शं
G
प्र
L
लो
G
भ्य
L
मां
G
दू
G
र
L
म
L
नु
G
प्र
L
या
G
तम्
L
ह
L
तं
G
क
L
थं
G
चि
G
न्म
L
ह
L
ता
G
श्र
L
मे
G
ण
L
स
L
रा
G
क्ष
L
सो
G
भू
G
न्म्रि
L
य
L
मा
G
ण
L
ए
G
व
L
Verse 3.55.20
<lg xml:id="R.3.55.20" n="3.55.20">
  <l>मनश्च मे दीनमिहाप्रहृष्टं चक्षुश्च सव्यं कुरुते विकारम् ।</l>
  <l>असंशयं लक्ष्मण नास्ति सीता हृता मृता वा पथि वर्तते वा ॥ २० ॥</l>
</lg>
म
L
न
G
श्च
L
मे
G
दी
G
न
L
मि
L
हा
G
प्र
L
हृ
G
ष्टं
G
च
G
क्षु
G
श्च
L
स
G
व्यं
G
कु
L
रु
L
ते
G
वि
L
का
G
रम्
L
अ
L
सं
G
श
L
यं
G
ल
G
क्ष्म
L
ण
L
ना
G
स्ति
L
सी
G
ता
G
हृ
L
ता
G
मृ
L
ता
G
वा
G
प
L
थि
L
व
G
र्त
L
ते
G
वा
G
Verse 3.56.20
<lg xml:id="R.3.56.20" n="3.56.20">
  <l>स्वमाश्रमं संप्रविगाह्य वीरो विहारदेशाननुसृत्य कांश्चित् ।</l>
  <l>एतत्तदित्येव निवासभूमौ प्रहृष्टरोमा व्यथितो बभूव ॥ २० ॥</l>
</lg>
स्व
L
मा
G
श्र
L
मं
G
सं
G
प्र
L
वि
L
गा
G
ह्य
L
वी
G
रो
G
वि
L
हा
G
र
L
दे
G
शा
G
न
L
नु
L
सृ
G
त्य
L
कां
G
श्चित्
L
ए
G
त
G
त्त
L
दि
G
त्ये
G
व
L
नि
L
वा
G
स
L
भू
G
मौ
G
प्र
L
हृ
G
ष्ट
L
रो
G
मा
G
व्य
L
थि
L
तो
G
ब
L
भू
G
व
L
Verse 3.57.24
<lg xml:id="R.3.57.24" n="3.57.24">
  <l>विकृष्य चापं परिधाय सायकं सलील बाणेन च ताडितो मया ।</l>
  <l>मार्गीं तनुं त्यज्य च विक्लवस्वरो बभूव केयूरधरः स राक्षसः ॥ २४ ॥</l>
</lg>
वि
L
कृ
G
ष्य
L
चा
G
पं
G
प
L
रि
L
धा
G
य
L
सा
G
य
L
कं
G
स
L
ली
G
ल
L
बा
G
णे
G
न
L
च
L
ता
G
डि
L
तो
G
म
L
या
G
मा
G
र्गीं
G
त
L
नुं
G
त्य
G
ज्य
L
च
L
वि
G
क्ल
L
व
G
स्व
L
रो
G
ब
L
भू
G
व
L
के
G
यू
G
र
L
ध
L
रः
G
स
L
रा
G
क्ष
L
सः
G
Verse 3.61.16
<lg xml:id="R.3.61.16" n="3.61.16">
  <l>शीलेन साम्ना विनयेन सीतां नयेन न प्राप्स्यसि चेन्नरेन्द्र ।</l>
  <l>ततः समुत्सादय हेमपुङ्खैर्महेन्द्रवज्रप्रतिमैः शरौघैः ॥ १६ ॥</l>
</lg>
शी
G
ले
G
न
L
सा
G
म्ना
G
वि
L
न
L
ये
G
न
L
सी
G
तां
G
न
L
ये
G
न
L
न
G
प्रा
G
प्स्य
L
सि
L
चे
G
न्न
L
रे
G
न्द्र
L
त
L
तः
G
स
L
मु
G
त्सा
G
द
L
य
L
हे
G
म
L
पु
G
ङ्खै
G
र्म
L
हे
G
न्द्र
L
व
G
ज्र
G
प्र
L
ति
L
मैः
G
श
L
रौ
G
घैः
G
Verse 3.63.26
<lg xml:id="R.3.63.26" n="3.63.26">
  <l>निकृत्तपक्षं रुधिरावसिक्तं तं गृध्रराजं परिरभ्य रामः ।</l>
  <l>क्व मैथिलि प्राणसमा ममेति विमुच्य वाचं निपपात भूमौ ॥ २६ ॥</l>
</lg>
नि
L
कृ
G
त्त
L
प
G
क्षं
G
रु
L
धि
L
रा
G
व
L
सि
G
क्तं
G
तं
G
गृ
G
ध्र
L
रा
G
जं
G
प
L
रि
L
र
G
भ्य
L
रा
G
मः
G
क्व
L
मै
G
थि
L
लि
G
प्रा
G
ण
L
स
L
मा
G
म
L
मे
G
ति
L
वि
L
मु
G
च्य
L
वा
G
चं
G
नि
L
प
L
पा
G
त
L
भू
G
मौ
G
Verse 3.69.36
<lg xml:id="R.3.69.36" n="3.69.36">
  <l>स तत्कबन्धः प्रतिपद्य रूपं वृतः श्रिया भास्करतुल्यदेहः ।</l>
  <l>निदर्शयन्राममवेक्ष्य खस्थः सख्यं कुरुष्वेति तदाभ्युवाच ॥ ३६ ॥</l>
</lg>
स
L
त
G
त्क
L
ब
G
न्धः
G
प्र
L
ति
L
प
G
द्य
L
रू
G
पं
G
वृ
L
तः
G
श्रि
L
या
G
भा
G
स्क
L
र
L
तु
G
ल्य
L
दे
G
हः
G
नि
L
द
G
र्श
L
य
G
न्रा
G
म
L
म
L
वे
G
क्ष्य
L
ख
G
स्थः
G
स
G
ख्यं
G
कु
L
रु
G
ष्वे
G
ति
L
त
L
दा
G
भ्यु
L
वा
G
च
L
Verse 4.1.48
<lg xml:id="R.4.1.48" n="4.1.48">
  <l>निरीक्षमाणः सहसा महात्मा सर्वं वनं निर्झरकन्दरं च ।</l>
  <l>उद्विग्नचेताः सह लक्ष्मणेन विचार्य दुःखोपहतः प्रतस्थे ॥ ४८ ॥</l>
</lg>
नि
L
री
G
क्ष
L
मा
G
णः
G
स
L
ह
L
सा
G
म
L
हा
G
त्मा
G
स
G
र्वं
G
व
L
नं
G
नि
G
र्झ
L
र
L
क
G
न्द
L
रं
G
च
L
उ
G
द्वि
G
ग्न
L
चे
G
ताः
G
स
L
ह
L
ल
G
क्ष्म
L
णे
G
न
L
वि
L
चा
G
र्य
L
दुः
G
खो
G
प
L
ह
L
तः
G
प्र
L
त
G
स्थे
G
Verse 4.1.49
<lg xml:id="R.4.1.49" n="4.1.49">
  <l>तावृष्यमूकं सहितौ प्रयातौ सुग्रीवशाखामृगसेवितं तम् ।</l>
  <l>त्रस्तास्तु दृष्ट्वा हरयो बभूवुर्महौजसौ राघवलक्ष्मणौ तौ ॥ ४९ ॥</l>
</lg>
ता
G
वृ
G
ष्य
L
मू
G
कं
G
स
L
हि
L
तौ
G
प्र
L
या
G
तौ
G
सु
G
ग्री
G
व
L
शा
G
खा
G
मृ
L
ग
L
से
G
वि
L
तं
G
तम्
L
त्र
G
स्ता
G
स्तु
L
दृ
G
ष्ट्वा
G
ह
L
र
L
यो
G
ब
L
भू
G
वु
G
र्म
L
हौ
G
ज
L
सौ
G
रा
G
घ
L
व
L
ल
G
क्ष्म
L
णौ
G
तौ
G
Verse 4.2.28
<lg xml:id="R.4.2.28" n="4.2.28">
  <l>तथेति संपूज्य वचस्तु तस्य कपेः सुभीतस्य दुरासदस्य ।</l>
  <l>महानुभावो हनुमान्ययौ तदा स यत्र रामोऽतिबलश्च लक्ष्मणः ॥ २८ ॥</l>
</lg>
त
L
थे
G
ति
L
सं
G
पू
G
ज्य
L
व
L
च
G
स्तु
L
त
G
स्य
L
क
L
पेः
G
सु
L
भी
G
त
G
स्य
L
दु
L
रा
G
स
L
द
G
स्य
L
म
L
हा
G
नु
L
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G
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G
ह
L
नु
L
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G
न्य
L
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G
त
L
दा
G
स
L
य
G
त्र
L
रा
G
मो
G
ति
L
ब
L
ल
G
श्च
L
ल
G
क्ष्म
L
णः
G
Verse 4.6.23
<lg xml:id="R.4.6.23" n="4.6.23">
  <l>मम दयिततमा हृता वनाद्रजनिचरेण विमथ्य येन सा ।</l>
  <l>कथय मम रिपुं तमद्य वै प्रवगपते यमसंनिधिं नयामि ॥ २३ ॥</l>
</lg>
म
L
म
L
द
L
यि
L
त
L
त
L
मा
G
हृ
L
ता
G
व
L
ना
G
द्र
L
ज
L
नि
L
च
L
रे
G
ण
L
वि
L
म
G
थ्य
L
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G
न
L
सा
G
क
L
थ
L
य
L
म
L
म
L
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पुं
G
त
L
म
G
द्य
L
वै
G
प्र
L
व
L
ग
L
प
L
ते
G
य
L
म
L
सं
G
नि
L
धिं
G
न
L
या
G
मि
L
Verse 4.7.23
<lg xml:id="R.4.7.23" n="4.7.23">
  <l>महानुभावस्य वचो निशम्य हरिर्नराणामृषभस्य तस्य ।</l>
  <l>कृतं स मेने हरिवीर मुख्यस्तदा स्वकार्यं हृदयेन विद्वान् ॥ २३ ॥</l>
</lg>
म
L
हा
G
नु
L
भा
G
व
G
स्य
L
व
L
चो
G
नि
L
श
G
म्य
L
ह
L
रि
G
र्न
L
रा
G
णा
G
मृ
L
ष
L
भ
G
स्य
L
त
G
स्य
L
कृ
L
तं
G
स
L
मे
G
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G
ह
L
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वी
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र
L
मु
G
ख्य
G
स्त
L
दा
G
स्व
L
का
G
र्यं
G
हृ
L
द
L
ये
G
न
L
वि
G
द्वान्
G
Verse 4.14.21
<lg xml:id="R.4.14.21" n="4.14.21">
  <l>ततः स जीमूतगणप्रणादो नादं व्यमुञ्चत्त्वरया प्रतीतः ।</l>
  <l>सूर्यात्मजः शौर्यविवृद्धतेजाः सरित्पतिर्वानिलचञ्चलोर्मिः ॥ २१ ॥</l>
</lg>
त
L
तः
G
स
L
जी
G
मू
G
त
L
ग
L
ण
G
प्र
L
णा
G
दो
G
ना
G
दं
G
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L
मु
G
ञ्च
G
त्त्व
L
र
L
या
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प्र
L
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G
तः
G
सू
G
र्या
G
त्म
L
जः
G
शौ
G
र्य
L
वि
L
वृ
G
द्ध
L
ते
G
जाः
G
स
L
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G
त्प
L
ति
G
र्वा
G
नि
L
ल
L
च
G
ञ्च
L
लो
G
र्मिः
G
Verse 4.16.27
<lg xml:id="R.4.16.27" n="4.16.27">
  <l>अथोक्षितः शोणिततोयविस्रवैः सुपुष्पिताशोक इवानिलोद्धतः ।</l>
  <l>विचेतनो वासवसूनुराहवे प्रभ्रंशितेन्द्रध्वजवत्क्षितिं गतः ॥ २७ ॥</l>
</lg>
अ
L
थो
G
क्षि
L
तः
G
शो
G
णि
L
त
L
तो
G
य
L
वि
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स्र
L
वैः
G
सु
L
पु
G
ष्पि
L
ता
G
शो
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क
L
इ
L
वा
G
नि
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लो
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द्ध
L
तः
G
वि
L
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त
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वा
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स
L
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L
सू
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नु
L
रा
G
ह
L
वे
G
प्र
G
भ्रं
G
शि
L
ते
G
न्द्र
G
ध्व
L
ज
L
व
G
त्क्षि
L
तिं
G
ग
L
तः
G
Verse 4.17.45
<lg xml:id="R.4.17.45" n="4.17.45">
  <l>इत्येवमुक्त्वा परिशुष्कवक्त्रः शराभिघाताद्व्यथितो महात्मा ।</l>
  <l>समीक्ष्य रामं रविसंनिकाशं तूष्णीं बभूवामरराजसूनुः ॥ ४५ ॥</l>
</lg>
इ
G
त्ये
G
व
L
मु
G
क्त्वा
G
प
L
रि
L
शु
G
ष्क
L
व
G
क्त्रः
G
श
L
रा
G
भि
L
घा
G
ता
G
द्व्य
L
थि
L
तो
G
म
L
हा
G
त्मा
G
स
L
मी
G
क्ष्य
L
रा
G
मं
G
र
L
वि
L
सं
G
नि
L
का
G
शं
G
तू
G
ष्णीं
G
ब
L
भू
G
वा
G
म
L
र
L
रा
G
ज
L
सू
G
नुः
G
Verse 4.19.27
<lg xml:id="R.4.19.27" n="4.19.27">
  <l>समीक्ष्य व्यथिता भूमौ संभ्रान्ता निपपात ह ।</l>
  <l>सुप्तेव पुनरुत्थाय आर्यपुत्रेति क्रोशती ॥ २७ ॥</l>
</lg>
स
L
मी
G
क्ष्य
G
व्य
L
थि
L
ता
G
भू
G
मौ
G
सं
G
भ्रा
G
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G
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L
प
L
पा
G
त
L
ह
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सु
G
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G
व
L
पु
L
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L
रु
G
त्था
G
य
L
आ
G
र्य
L
पु
G
त्रे
G
ति
G
क्रो
G
श
L
ती
G
Verse 4.20.23
<lg xml:id="R.4.20.23" n="4.20.23">
  <l>किमप्रियं ते प्रियचारुवेष कृतं मया नाथ सुतेन वा ते ।</l>
  <l>सहायिनीमद्य विहाय वीर यमक्षयं गच्छसि दुर्विनीतम् ॥ २३ ॥</l>
</lg>
कि
L
म
G
प्रि
L
यं
G
ते
G
प्रि
L
य
L
चा
G
रु
L
वे
G
ष
L
कृ
L
तं
G
म
L
या
G
ना
G
थ
L
सु
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ते
G
न
L
वा
G
ते
G
स
L
हा
G
यि
L
नी
G
म
G
द्य
L
वि
L
हा
G
य
L
वी
G
र
L
य
L
म
G
क्ष
L
यं
G
ग
G
च्छ
L
सि
L
दु
G
र्वि
L
नी
G
तम्
L
Verse 4.20.24
<lg xml:id="R.4.20.24" n="4.20.24">
  <l>यद्यप्रियं किंचिदसंप्रधार्य कृतं मया स्यात्तव दीर्घबाहो ।</l>
  <l>क्षमस्व मे तद्धरिवंश नाथ व्रजामि मूर्ध्ना तव वीर पादौ ॥ २४ ॥</l>
</lg>
य
G
द्य
G
प्रि
L
यं
G
किं
G
चि
L
द
L
सं
G
प्र
L
धा
G
र्य
L
कृ
L
तं
G
म
L
या
G
स्या
G
त्त
L
व
L
दी
G
र्घ
L
बा
G
हो
G
क्ष
L
म
G
स्व
L
मे
G
त
G
द्ध
L
रि
L
वं
G
श
L
ना
G
थ
G
व्र
L
जा
G
मि
L
मू
G
र्ध्ना
G
त
L
व
L
वी
G
र
L
पा
G
दौ
G
Verse 4.20.25
<lg xml:id="R.4.20.25" n="4.20.25">
  <l>तथा तु तारा करुणं रुदन्ती भर्तुः समीपे सह वानरीभिः ।</l>
  <l>व्यवस्यत प्रायमनिन्द्यवर्णा उपोपवेष्टुं भुवि यत्र वाली ॥ २५ ॥</l>
</lg>
त
L
था
G
तु
L
ता
G
रा
G
क
L
रु
L
णं
G
रु
L
द
G
न्ती
G
भ
G
र्तुः
G
स
L
मी
G
पे
G
स
L
ह
L
वा
G
न
L
री
G
भिः
G
व्य
L
व
G
स्य
L
त
G
प्रा
G
य
L
म
L
नि
G
न्द्य
L
व
G
र्णा
G
उ
L
पो
G
प
L
वे
G
ष्टुं
G
भु
L
वि
L
य
G
त्र
L
वा
G
ली
G
Verse 4.22.26
<lg xml:id="R.4.22.26" n="4.22.26">
  <l>ततस्तु तारा व्यसनार्णव प्लुता मृतस्या भर्तुर्वदनं समीक्ष्य सा ।</l>
  <l>जगाम भूमिं परिरभ्य वालिनं महाद्रुमं छिन्नमिवाश्रिता लता ॥ २६ ॥</l>
</lg>
त
L
त
G
स्तु
L
ता
G
रा
G
व्य
L
स
L
ना
G
र्ण
L
व
G
प्लु
L
ता
G
मृ
L
त
G
स्या
G
भ
G
र्तु
G
र्व
L
द
L
नं
G
स
L
मी
G
क्ष्य
L
सा
G
ज
L
गा
G
म
L
भू
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मिं
G
प
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G
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G
लि
L
नं
G
म
L
हा
G
द्रु
L
मं
G
छि
G
न्न
L
मि
L
वा
G
श्रि
L
ता
G
ल
L
ता
G
Verse 4.26.23
<lg xml:id="R.4.26.23" n="4.26.23">
  <l>नियम्य कोपं प्रतिपाल्यतां शरत्क्षमस्व मासांश्चतुरो मया सह ।</l>
  <l>वसाचलेऽस्मिन्मृगराजसेविते संवर्धयञ्शत्रुवधे समुद्यतः ॥ २३ ॥</l>
</lg>
नि
L
य
G
म्य
L
को
G
पं
G
प्र
L
ति
L
पा
G
ल्य
L
तां
G
श
L
र
G
त्क्ष
L
म
G
स्व
L
मा
G
सां
G
श्च
L
तु
L
रो
G
म
L
या
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स
L
ह
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व
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सा
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L
ले
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G
न्मृ
L
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G
ज
L
से
G
वि
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ते
G
सं
G
व
G
र्ध
L
य
G
ञ्श
G
त्रु
L
व
L
धे
G
स
L
मु
G
द्य
L
तः
G
Verse 4.27.16
<lg xml:id="R.4.27.16" n="4.27.16">
  <l>संप्रस्थिता मानसवासलुब्धाः प्रियान्विताः संप्रति चक्रवाकः ।</l>
  <l>अभीक्ष्णवर्षोदकविक्षतेषु यानानि मार्गेषु न संपतन्ति ॥ १६ ॥</l>
</lg>
सं
G
प्र
G
स्थि
L
ता
G
मा
G
न
L
स
L
वा
G
स
L
लु
G
ब्धाः
G
प्रि
L
या
G
न्वि
L
ताः
G
सं
G
प्र
L
ति
L
च
G
क्र
L
वा
G
कः
G
अ
L
भी
G
क्ष्ण
L
व
G
र्षो
G
द
L
क
L
वि
G
क्ष
L
ते
G
षु
L
या
G
ना
G
नि
L
मा
G
र्गे
G
षु
L
न
L
सं
G
प
L
त
G
न्ति
L
Verse 4.27.17
<lg xml:id="R.4.27.17" n="4.27.17">
  <l>क्वचित्प्रकाशं क्वचिदप्रकाशं नभः प्रकीर्णाम्बुधरं विभाति ।</l>
  <l>क्वचित्क्वचित्पर्वतसंनिरुद्धं रूपं यथा शान्तमहार्णवस्य ॥ १७ ॥</l>
</lg>
क्व
L
चि
G
त्प्र
L
का
G
शं
G
क्व
L
चि
L
द
G
प्र
L
का
G
शं
G
न
L
भः
G
प्र
L
की
G
र्णा
G
म्बु
L
ध
L
रं
G
वि
L
भा
G
ति
L
क्व
L
चि
G
त्क्व
L
चि
G
त्प
G
र्व
L
त
L
सं
G
नि
L
रु
G
द्धं
G
रू
G
पं
G
य
L
था
G
शा
G
न्त
L
म
L
हा
G
र्ण
L
व
G
स्य
L
Verse 4.27.18
<lg xml:id="R.4.27.18" n="4.27.18">
  <l>व्यामिश्रितं सर्जकदम्बपुष्पैर्नवं जलं पर्वतधातुताम्रम् ।</l>
  <l>मयूरकेकाभिरनुप्रयातं शैलापगाः शीघ्रतरं वहन्ति ॥ १८ ॥</l>
</lg>
व्या
G
मि
G
श्रि
L
तं
G
स
G
र्ज
L
क
L
द
G
म्ब
L
पु
G
ष्पै
G
र्न
L
वं
G
ज
L
लं
G
प
G
र्व
L
त
L
धा
G
तु
L
ता
G
म्रम्
L
म
L
यू
G
र
L
के
G
का
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L
र
L
नु
G
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L
या
G
तं
G
शै
G
ला
G
प
L
गाः
G
शी
G
घ्र
L
त
L
रं
G
व
L
ह
G
न्ति
L
Verse 4.27.19
<lg xml:id="R.4.27.19" n="4.27.19">
  <l>रसाकुलं षट्पदसंनिकाशं प्रभुज्यते जम्बुफलं प्रकामम् ।</l>
  <l>अनेकवर्णं पवनावधूतं भूमौ पतत्याम्रफलं विपक्वम् ॥ १९ ॥</l>
</lg>
र
L
सा
G
कु
L
लं
G
ष
G
ट्प
L
द
L
सं
G
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G
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L
भु
G
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L
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L
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G
व
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G
तं
G
भू
G
मौ
G
प
L
त
G
त्या
G
म्र
L
फ
L
लं
G
वि
L
प
G
क्वम्
L
Verse 4.27.20
<lg xml:id="R.4.27.20" n="4.27.20">
  <l>विद्युत्पताकाः सबलाक मालाः शैलेन्द्रकूटाकृतिसंनिकाशाः ।</l>
  <l>गर्जन्ति मेघाः समुदीर्णनादा मत्तगजेन्द्रा इव संयुगस्थः ॥ २० ॥</l>
</lg>
वि
G
द्यु
G
त्प
L
ता
G
काः
G
स
L
ब
L
ला
G
क
L
मा
G
लाः
G
शै
G
ले
G
न्द्र
L
कू
G
टा
G
कृ
L
ति
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सं
G
नि
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का
G
शाः
G
ग
G
र्ज
G
न्ति
L
मे
G
घाः
G
स
L
मु
L
दी
G
र्ण
L
ना
G
दा
G
म
G
त्त
L
ग
L
जे
G
न्द्रा
G
इ
L
व
L
सं
G
यु
L
ग
G
स्थः
G
Verse 4.27.22
<lg xml:id="R.4.27.22" n="4.27.22">
  <l>निद्रा शनैः केशवमभ्युपैति द्रुतं नदी सागरमभ्युपैति ।</l>
  <l>हृष्टा बलाका घनमभ्युपैति कान्ता सकामा प्रियमभ्युपैति ॥ २२ ॥</l>
</lg>
नि
G
द्रा
G
श
L
नैः
G
के
G
श
L
व
L
म
G
भ्यु
L
पै
G
ति
G
द्रु
L
तं
G
न
L
दी
G
सा
G
ग
L
र
L
म
G
भ्यु
L
पै
G
ति
L
हृ
G
ष्टा
G
ब
L
ला
G
का
G
घ
L
न
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म
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का
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मा
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प्रि
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य
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म
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भ्यु
L
पै
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ति
L
Verse 4.27.24
<lg xml:id="R.4.27.24" n="4.27.24">
  <l>वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति ध्यायन्ति नृत्यन्ति समाश्वसन्ति ।</l>
  <l>नद्यो घना मत्तगजा वनान्ताः प्रियाविनीहाः शिखिनः प्लवंगाः ॥ २४ ॥</l>
</lg>
व
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ह
G
न्ति
L
व
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न्ति
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G
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प्ल
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वं
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गाः
G
Verse 4.27.25
<lg xml:id="R.4.27.25" n="4.27.25">
  <l>प्रहर्षिताः केतकपुष्पगन्धमाघ्राय हृष्टा वननिर्झरेषु ।</l>
  <l>प्रपात शब्दाकुलिता गजेन्द्राः सार्धं मयूरैः समदा नदन्ति ॥ २५ ॥</l>
</lg>
प्र
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ह
G
र्षि
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ताः
G
के
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त
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क
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पु
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ष्प
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न्ध
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हृ
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ष्टा
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व
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प्र
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म
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दा
G
न
L
द
G
न्ति
L
Verse 4.27.26
<lg xml:id="R.4.27.26" n="4.27.26">
  <l>धारानिपातैरभिहन्यमानाः कदम्बशाखासु विलम्बमानाः ।</l>
  <l>क्षणार्जितं पुष्परसावगाढं शनैर्मदं षट्चरणास्त्यजन्ति ॥ २६ ॥</l>
</lg>
धा
G
रा
G
नि
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पा
G
तै
G
र
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भि
L
ह
G
न्य
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मा
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नाः
G
क
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द
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म्ब
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खा
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म्ब
L
मा
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नाः
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क्ष
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पु
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ष्प
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र
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सा
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व
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नै
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दं
G
ष
G
ट्च
L
र
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णा
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स्त्य
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ज
G
न्ति
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Verse 4.27.31
<lg xml:id="R.4.27.31" n="4.27.31">
  <l>नीलेषु नीला नववारिपूर्णा मेघेषु मेघाः प्रविभान्ति सक्ताः ।</l>
  <l>दवाग्निदग्धेषु दवाग्निदग्धाः शैलेषु शैला इव बद्धमूलाः ॥ ३१ ॥</l>
</lg>
नी
G
ले
G
षु
L
नी
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ला
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न
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व
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वा
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पू
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घे
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मे
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प्र
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न्ति
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स
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क्ताः
G
द
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द
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ग्धे
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षु
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द
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वा
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ग्नि
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द
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ग्धाः
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शै
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ले
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षु
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शै
G
ला
G
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व
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ब
G
द्ध
L
मू
G
लाः
G