Reports » इन्द्रसहस्रे कटाक्षस्तबकः
Updated 2026-02-22 23:41
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Verse 1
<lg n="1"> <l>तं दशशताक्षं शीतलकटाक्षम् ।</l> <l>नौमि धुतपाशं वज्रधरमीशम् ॥ १ ॥</l> </lg>
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Verse 2
<lg n="2"> <l>उग्रमपि दक्षं भासुरकटाक्षम् ।</l> <l>वीर्यधुतवृत्रं नौम्यदितिपुत्रम् ॥ २ ॥</l> </lg>
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Verse 3
<lg n="3"> <l>आर्तजनपक्षं रक्षककटाक्षम् ।</l> <l>प्राणिगणतातं नौमि पुरुहूतम् ॥ ३ ॥</l> </lg>
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Verse 4
<lg n="4"> <l>देवमसदृक्षं पावनकटाक्षम् ।</l> <l>नौमि बहुमायं वासवममेयम् ॥ ४ ॥</l> </lg>
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Verse 5
<lg n="5"> <l>तं पुरुषमीडे स्तुत्यगणलक्षम् ।</l> <l>स्वर्भुवनराज्ञी मोहनकटाक्षम् ॥ ५ ॥</l> </lg>
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Verse 6
<lg n="6"> <l>यत्र तव दृष्टिर्वज्रधर हृद्या ।</l> <l>नव्ययुगकर्त्री तत्र वरविद्या ॥ ६ ॥</l> </lg>
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Verse 7
<lg n="7"> <l>तत्र वरलक्ष्मीः सन्ततमशून्या ।</l> <l>तत्र सुगुणानां सम्पदपि मान्या ॥ ७ ॥</l> </lg>
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Verse 8
<lg n="8"> <l>तत्र बलमुग्रं शत्रुमदहारि ।</l> <l>तत्र नयवित्त्वं विश्वहितकारि ॥ ८ ॥</l> </lg>
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वि
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Verse 9
<lg n="9"> <l>यं तव बलारे पावयति दृष्टिः ।</l> <l>तत्र नरवर्ये सर्वशुभवृष्टिः ॥ ९ ॥</l> </lg>
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Verse 10
<lg n="10"> <l>यत्र तव पूर्णा दृष्टिरतिभद्रा ।</l> <l>भेदशतबुद्धिस्तस्य न दरिद्रा ॥ १० ॥</l> </lg>
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Verse 11
<lg n="11"> <l>किं नु सुकृतादी किं दुरितखादी ।</l> <l>शक्र तव रक्षःसूदनकटाक्षः ॥ ११ ॥</l> </lg>
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क्षः
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क्षः
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Verse 12
<lg n="12"> <l>भक्तिरसिकानां पापततिखादी ।</l> <l>सोऽयमितरेषां पक्वसुकृतादी ॥ १२ ॥</l> </lg>
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Verse 13
<lg n="13"> <l>पापततिखादी यत्र स कृपावान् ।</l> <l>तस्य हृदि बोधः सर्वसमतावान् ॥ १३ ॥</l> </lg>
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Verse 14
<lg n="14"> <l>तस्य जगदर्थे सर्वमपि कार्यम् ।</l> <l>अद्भुतमपारं दिव्यमपि वीर्यम् ॥ १४ ॥</l> </lg>
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Verse 15
<lg n="15"> <l>पक्वसुकृतादी यत्र सविचित्रः ।</l> <l>तस्य खलु भोगः काममतिमात्रः ॥ १५ ॥</l> </lg>
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Verse 16
<lg n="16"> <l>ये गिरिशनाम्रा ये च हरिनाम्ना ।</l> <l>ये गणपनाम्ना ये च रविनाम्ना ॥ १६ ॥</l> </lg>
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Verse 17
<lg n="17"> <l>शक्तिरिति नाम्ना ये बहुलधाम्ना ।</l> <l>ये च मतिमन्तो यह्न इति नाम्ना ॥ १७ ॥</l> </lg>
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Verse 18
<lg n="18"> <l>त्वामयि भजन्ते भक्त्यतिशयेन ।</l> <l>सर्वसुररूपं भूरि विभवेन ॥ १८ ॥</l> </lg>
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Verse 19
<lg n="19"> <l>तेष्वपि दिवो भूनाथ तव दक्षाः ।</l> <l>भक्तजनरक्षा दीक्षितकटाक्षाः ॥ १९ ॥</l> </lg>
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दी
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क
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Verse 20
<lg n="20"> <l>त्वत्पदमजानन्नप्यज पवित्रम् ।</l> <l>मङ्गलगुणस्ते दृक्पतनपात्रम् ॥ २० ॥</l> </lg>
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क्प
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न
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त्रम्
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Verse 21
<lg n="21"> <l>दृष्टिवशतस्ते प्रेष्ठफलधारा ।</l> <l>संश्रितकुलेष्वप्यप्रतिमसारा ॥ २१ ॥</l> </lg>
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दृ
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त
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स्ते
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प्य
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Verse 22
<lg n="22"> <l>पावनकटाक्षैः संशमय पापम् ।</l> <l>शीतलकटाक्षैः शक्र मम तापम् । २२ ॥</l> </lg>
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Verse 23
<lg n="23"> <l>मङ्गलकटाक्षैः साधय ममेष्टम् ।</l> <l>किं च विबुधानां नाथ हर कष्टम् ॥ २३ ॥</l> </lg>
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थ
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ह
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र
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क
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ष्टम्
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Verse 24
<lg n="24"> <l>भासुरकटाक्षैर्भासयतु मह्यम् ।</l> <l>नाकनरनाथो ज्योतिरतिगुह्यम् ॥ २४ ॥</l> </lg>
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