Reports » हेरम्बोपनिषत्
Updated 2026-02-22 23:41
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Text
Devanagari text is well-formed ⚠ Partial (45/47)
Unexpected character ':' in text <स एव कर्माणि करोति देवो ह्येको गणेशो बहुधा निविष्ट: ।>
<l>स एव कर्माणि करोति देवो ह्येको गणेशो बहुधा निविष्ट: ।</l>
Unexpected character 'n' in text <य इमां हेरम्बोपनिषदमधीते स सर्वाn कामाn लभते । स सर्वपापैर्मुक्तो भवति । स सर्वैर्वेदैर्ज्ञातो भवति । स सर्वैर्देवैः पूजितो भवति । स सर्ववेदपारायणफलं लभते । स गणेशसायुज्यमवाप्नोति य एवं वेद । इत्युपनिषत् ॥>
<p n="p3">य इमां हेरम्बोपनिषदमधीते स सर्वाn कामाn लभते । स सर्वपापैर्मुक्तो भवति । स सर्वैर्वेदैर्ज्ञातो भवति । स सर्वैर्देवैः पूजितो भवति । स सर्ववेदपारायणफलं लभते । स गणेशसायुज्यमवाप्नोति य एवं वेद । इत्युपनिषत् ॥</p>
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Meter
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Verse 1
<lg n="1"> <l>अधीहि भगवन्नात्मविद्यां प्रशस्तां यया जन्तुर्मुच्यते मायया च ।</l> <l>यतो दुःखाद्विमुक्तो याति लोकं परं शुभ्रं केवलं सात्त्विकं च ॥</l> </lg>
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Verse 2
<lg n="2"> <l>तां वै स होवाच महानुकम्पासिन्धुर्बन्धुर्भुवनस्य गोप्ता ।</l> <l>श्रद्धस्वैतद्गौरि सर्वात्मना त्वं मा ते भूयः संशयोऽस्मिन् कदाचित् ॥</l> </lg>
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Verse 3
<lg n="3"> <l>हेरम्बतत्त्वे परमात्मसारे नो वै योगान्नैव तपोबलेन ।</l> <l>नैवायुधप्रभावतो महेशि दग्धं पुरा त्रिपुरं दैवयोगात् ॥ ३ ॥</l> </lg>
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Verse 4
<lg n="4"> <l>तस्यापि हेरम्बगुरोः प्रसादाद्यथा विरिञ्चिर्गरुडो मुकुन्दः ।</l> <l>देवस्य यस्यैव बलेन भूयः स्वं स्वं हितं प्राप्य सुखेन सर्वम् ॥</l> </lg>
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Verse 5
<lg n="5"> <l>मोदन्ते स्वे स्वे पदे पुण्यलब्धे सर्वैर्देवैः पूजनीयो गणेशः ।</l> <l>प्रभुः प्रभूणामपि विघ्नराजः सिन्दूरवर्णः पुरुषः पुराणः ॥ ५ ॥</l> </lg>
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Verse 6
<lg n="6"> <l>लक्ष्मीसहायोऽद्वयकुञ्जराकृतिश्चतुर्भुजश्चन्द्रकलाकलापः ।</l> <l>मायाशरीरो मधुरस्वभावस्तस्य ध्यानात् पूजनात्तत्स्वभावाः ॥</l> </lg>
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Verse 7
<lg n="7"> <l>संसारपारं मुनयोऽपि यान्ति स वा ब्रह्मा स प्रजेशो हरिः सः ।</l> <l>इन्द्रः स चन्द्रः परमः परात्मा स एव सर्वो भुवनस्य साक्षी ॥</l> </lg>
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Verse 8
<lg n="8"> <l>स सर्वलोकस्य शुभाशुभस्य तं वै ज्ञात्वा मृत्युमत्येति जन्तुः ।</l> <l>नान्यः पन्था दुःखविमुक्तिहेतुः सर्वेषु भूतेषु गणेशमेकम् ॥ ८ ॥</l> </lg>
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Verse 9
<lg n="9"> <l>विज्ञाय तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते स एवमास्थाय शरीरमेकम् ।</l> <l>मायामयं मोहयतीव सर्वं स प्रत्यहं कुरुते कर्मकाले ॥ ९ ॥</l> </lg>
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Verse 11
<lg n="11"> <l>स वै बलं बलिनामग्रगण्यः पुण्यः शरण्यः सकलस्य जन्तोः ।</l> <l>नमेकदन्तं गजवक्त्रमीशं विज्ञाय दुःखान्तमुपैति सद्यः ॥ ११ ॥</l> </lg>
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Verse 13
<lg n="13"> <l>न मेऽन्तरायो न च कर्मलोपो न पुण्यपापे मम तन्मयस्य ।</l> <l>एवं विदित्वा गणनाथतत्त्वं निरन्तरायं निजबोधबीजम् ॥ १३ ॥</l> </lg>
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Verse 14
<lg n="14"> <l>क्षेमङ्करं सन्ततसौख्यहेतुं प्रयान्ति शुद्धं गणनाथतत्त्वम् ।</l> <l>विद्यामिमां प्राप्य गौरी महेशादभीष्टसिद्धिं समवाप सद्यः ।</l> <l>पूज्या परा सा च जजाप मन्त्रं शम्भुं पतिं प्राप्य मुदं ह्यवाप ॥</l> </lg>
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