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१०४
 
सुभाषितनीव्यां
 
पृष्ठम्
 
पृष्ठम्
 
कटूनामिह सार्थत्वात्
 
जनयत्यनले दाहं
 
५९
 
कठिनः कृशमूलच
 
४०
 
जनित्वापि महागोत्रे
 
२४
 
कलकण्ठगलास्वाद्ये
 
कलङ्किनि जले
 
९८
 
जलाशयस्य घोषेण
 
९ १
 
६५ जातिमात्रशरणा:
 
३७
 
काकानां कोकिलानां
 
९५ जोषमेकपदे
 
૪
 
कामाधिकरणप्राह्यः
 
कामं लिखतु
 
कुतश्चिदचलस्थानात्
 
केन चिद्दान्तकृत्येन
क्षोभितो विबुधैः
 
१५.
 
त
 
૭૪
 
तदेव गृह्यताम्
 
१४
 
८९.
 
तमः स्वभावमलिनं
 
३७
 
२५ तमिस्राचारिणां
 
७२
 
૨
 
तरतु विवित्सयाधि
 
४५
 
ग
 
तान् घ्नन्ति हन्त
 
१०
 
गतियोंम्ना
 
१९.
 
त्वचं मांस जीवं
 
८३
 
गरुत्मति सुपक्षतां
 
५.३
 
द
 
गुणजालप्रकर्षे
 
३१
 
दष्टसारङ्ग
 
१६
 
घ
 
दुष्टैरारोपितः
 
३६
 
घोरास्त्य कमिधांवैराः
 
चकोरानादर
 
४३
 
दृष्टपका प्रतिपदं
 
४०
 
देशकालविशेषेण
 
५७
 
२६ द्विजराजाइ
 
३१
 
छ
 
छन्दः प्रत्ययशुद्धात्मा
 
छिद्रं जनयताम्
 
छलिनं सत्कथानर्हम्
 
द्विजस्य सिंतपक्षस्य
 
२६ धर्मसेतुनिविष्टानां
 
५८ धुर्याणामपि
 
३५
 
९.६
 
ध
 
४९
 
१७
 
न