This page has been fully proofread once and needs a second look.

11 eft: 11
 
WA
 
<page>
<subtitle lang="sa">॥ श्रीः ॥</subtitle>
<title lang="sa">
॥ श्रीहयग्रीवस्तोत्रम् ॥
 
</title>
<verse lang="sa">
श्रीमान् वेङ्कटनाथार्य : कवितार्किककेसरी ।

वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ॥
 
</verse>
<ignore lang="sa">
-X*X-
 
</ignore>
<verse lang="sa">
ज्ञानानन्दमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम् ।

आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे ॥
 
१</verse>
<p lang="sa">
स्वतस्सिद्धं शुद्धस्फटिकमणि भूभृत्प्रतिभटं

सुधासधीध्रीचीभिर्द्युतिभि'ख<ref>1</ref>रवदातत्रिभुवनम् ।

अनन्तैस्त्रय्यन्तैरनुविहित हेपाषाहलहलं
 

हताशेषावद्यं हयवदनमीडीमहि महः ॥
 
२</p>
<verse lang="sa">
समाहारस्साम्नां प्रतिपदमृचां धाम यजुषां

लयः प्रत्यूहानां लहरि वितीति र्बोधजलधेः

कथा' <ref>2</ref>दर्पक्षुभ्य' <ref>3</ref>त्कथककुल कोलाहलभवं

हरत्वन्तर्ध्वान्तं हयवदन हेषा हलहलः ॥
 
३</verse>
<verse lang="sa">
प्राची सन्ध्या काचिदन्तर्निशायाः

प्रज्ञादृष्टेरञ्जन श्रीरपूर्वा ।

वक्त्री वेदान् भातु मे वाजिवक्त्रा

वागीशाख्या वासुदेवस्य मूर्तिः ॥
 
2
 
४</verse>
<footnote mark="
1 '" lang="sa">&apos;अपताप'&apos; इति पाठान्तरम् ।
 
'
</footnote>
<footnote mark="2" lang="sa">&apos;
हृप्यत्कौतस्कुत कलह' &apos;</footnote>
<footnote mark="
3 '">&apos;कलिकथक'&apos; - पा.
 

 

 
C
 
</footnote>
</page>