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सप्तति रत्न मालिका :-
 
भाद्रपदमासगत विक्ष्णुविमलर्क्षे
 
वेङ्कटमहीभ्रपति तीर्थदिनभूते ।
 
श्रीमद्वेदान्तदेशिकमङ्गलाशासनम्
 
प्रादुरभवज्जगति दैत्य रिपुघण्टा
 
हन्त कवितार्किक मृगेन्द्र गुरुमूर्त्या ॥
 
(श्लो-१०)
 
सशङ्खचक्रलान्छनः सदूर्ध्वपुण्ड्रमण्डितः
 
सकण्ठलग्नसत्तलस्यनर्घ पद्ममालिकः ।
 
सितान्तरीय सूत्तरीय यज्ञसूत्र शोभितः
 
ममाविरस्तु मानसे गुरुः स वेङ्कटेश्वरः ॥
 
(श्लो-५९)
 
अनन्त सूरि सूनवेऽभिनन्द्यमान वैभवाद्
 
दिगन्त वादिहंस जैत्रकालमेघ देशिकात् ।
 
उपात्त सर्वशासनाय हन्त वर्ष विंशतौ
 
पुनःपुनर्नमस्क्रियाऽस्तु वेङ्कटेश सूरये ॥
 
(श्लो- १७)
 
कवितार्किक कलभव्रज कबलीकृतिसिंहं
कमलापति करुणारस परिवर्धित बोधम् ।
यतिनायक पदपङ्कज युगली परतन्त्रं
 
भज मानस बुधवेङ्कटपतिदेशिकमनिशम् ॥ ( श्लो - ६५)
 
कलये सततं करुणा जलधिं
 
करुणा विषयं कमलाधिपतेः ।
 
कलि वैरि शठारि वचो रसिकं
 
कवितार्किक केसरि सूरि गुरुम् ॥
 
(श्लो-२३)
 
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