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श्रीः
 
गरुडदण्डकः
 
श्रीमान् वेङ्कटनाथार्यः कवितार्किककेसरी ।
वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ॥
 
.928
 
नमः पन्नग नद्धाय वैकुण्ठ वशवर्तिने ।
 
श्रुति सिन्धु सुधोत्पाद मन्दराय गरुत्मते ॥
 
1
 

 
929 गरुडमखिल वेद नीडाधिरूढं । द्विषत्पीडनोत्कण्ठिताकुण्ठ वैकुण्ठपीठीकृत-
स्कन्धमीडे स्वनीडागतिप्रीत रुद्रा सुकीर्ति स्तनाभोग गाढोपगूढ स्फुरत्कण्टक-
 
930
 
931
 
व्रात वेध व्यथा वेपमान द्विजिह्वाधिपाकल्प विष्फार्यमाण स्फटावाटिका रत्न
रोचिश्छटा राजि नीराजितं कान्ति कल्लोलिनी राजितम् ॥
 

 
जय गरुड सुपर्ण दवकराहार देवाधिपाहार हारिन् दिवौकस्पति क्षिप्त
दम्भोलि धारा किणाकल्प कल्पान्त वातूल कल्पोदयानल्प' वीरायितोद्य-
चमत्कार दैत्यारि जैलध्वजारोह निर्धारितोत्कर्ष संकर्षणात्मन् गरुत्मन्
मरुत्पञ्चकाधीश सत्यादि मूर्ते न कश्चित् समस्ते नमस्ते पुनस्ते
 
नमः ॥
 

 
नम इद महत्सपर्याय पर्याय निर्यात पक्षानिलास्फालनोद्वेल पाथोधि
वीची चपेटाहतागाध पाताल भांकार संक्रुद्ध नागेन्द्रपीडासृणी भाव
भास्वन्नख श्रेणये चण्ड तुण्डाय नृत्यद्भुजङ्गभुवे वज्रिणे दंष्ट्या तुभ्यम्
अध्यात्मविद्या विधेया विधेया भवद्दास्यमापादयेथा दयेथाश्च मे ॥ ४
 
। द्विषत्पीडनोत्कण्ठितारूढवैकुण्ठ
 
2 वीरायितोरचमत्कारि
 
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